अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस


अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस २१ फरवरीके मनावल जाला । १७ नवंबर, १९९९ के यूनेस्को एकर स्वीकृति देलेरहे । इ दिवसके मनावेके उद्देश्य विश्वमे भाषा, सांस्कृतिक विविधता आ बहुभाषिताके बढावा देवेके ह । यूनेस्कोद्धारा अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवसके घोषणासे बांग्लादेशके भाषा आन्दोलन दिवसके अन्तर्राष्ट्रीय स्वीकृति मिलल, जउन बांग्लादेशमे सन १९५२ से मातृभाषा (बंगाली भाषा) बोलेके अनुमति देवेके पडि कहके माग करेवाला विधार्थी मारलगइल दिनके संस्मरणमे इ दिवस मनावत आइलजात रहे । ओहसमय बंगलादेशके पूर्वी पाकिस्तान कहलजात रहे । बांगलादेशमे इ दिन एक दिनके राष्ट्रीय छुट्टी दिहलजाला ।

विश्वमे ६ हजारसे ज्यादा मातृभाषा मिलल बा । राज्य, व्यक्तिद्धारा मातृभाषाके संरक्षण नाहोए सकलासे केतना भाषा लोपहोखेके अवस्थामे बा । इहे सन्दर्भमे भोजपुरी भाषाके संरक्षण आ सम्बद्र्धन खातिर हमनी सबके एक होखेके पडि ।

राष्ट्रिय जनगणना २०६८ के प्रतिवेदन अनुसार देशमे जम्मा १२५ गो जातजाती आ १२३ गो मातृभाषा रहल तथ्यांक मिललबा । नेपालीके बाद मातृभाषाके रुपमे ज्यादा बोलेवाला भाषनमे मैथिलि, भोजपुरी, थारु, तामा∙ आ नेवार आगे बा ।

भोजपुरी भाषा, साहित्य, संस्कृति आ संस्कारके विकासमे नेपाल भोजपुरी साहित्य कला परिषद, बीरगंज, पर्साके बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहल बा । परिषदके अध्यक्ष श्री नागेन्द्र प्रसाद कानु के अगुवाईमे भोजपुरी भाषा, साहित्य, भोजपुरी कवि सम्मेलन, साहित्यकारलोगके सम्मान, साहित्यके बचाव, नेपालके पहिला भोजपुरी पाक्षिक समाचारपत्र सगुनके प्रकाशन, नेपाल टेलिविजनके सहयोगसे भोजपुरी टेली श्रृखला जानकीके निर्माण आ प्रसारण, भोजपुरी उपन्यास पपीहराके लेखन आ प्रकाशन आदि कार्य बहुत उल्लेखनिय बा । जेकरा भोजपुरीयन कहियो ना भुलावे पाई ।

गत बर्ष नेपाल पज्ञा प्रतिष्ठान आ आदिवासी जनजाति उत्थान राष्ट्रिय प्रतिष्ठानद्धारा फागुन ९ गते कमलादी स्थित पज्ञा भवनमे विचार गोष्ठीके आयोजना भइलरहे आ गोष्ठीमे अधिकारकर्मिलोग कार्यपत्र प्रस्तुत कइले रहे । कार्यपत्रमे मातृभाषाके सरकारी कामकाजीके भाषाके मान्यता दिहलजाव कहके जोड दिहलरहे । मातृभाषाके प्रयोगकरेके नामिलल मानव अधिकारके गम्भिर उल्लंघन भइल उ गोष्ठीमे भाग लिहल हरेक वक्तालोगके कथन रहे जेमे दुगो राय नइखे । गोष्ठीमे अवधी, केवट, भोजपुरी, नेपाल भाषा, जिरेल, लिम्बु, सन्थाल, धिमाल, ल्होमी, डोल्पा समेत २७ गो कविता वाचन कइलगइल रहे ।

भाषा जातीय पहिचान भइलाके कारण एकरा खातिर राज्यके सब भाषाके समान व्यवहार करेके चाहि । मातृभाषा जातीय पहिचान आ मानवअधिकार ह ओहिसे एकर संरक्षण आ विकास निरन्तर होखेके चाहि । भाषिक सवाल व्यक्तिके स्वतन्त्रता, सूचना आ शिक्षामे निर्वाध पहुच तथा संस्कृति पहिचानके हकसे सम्बन्धित ह ।

इ संसारमे बाचेके खातिर हमनीके दोसरो भाषाके जानेके चाहि बाकि सबदिना बाचेखातिर हमनिके अपने भाषा जानेके पडि । मातृभाषा नाजानल अपन पहिचान गुमावल बराबर होला । प्राकृतिक नियम अनुसारके व्यवहारके बात कइलजाई त मातृभाषामे इ संसारमे रहल ज्ञान, सीप, व्यवहार आदि सिखेला हरेक बालबालिकाके पहिला अधिकार ह ।

नेपालमे भाषा खातिर आन्दोलन भइल घटना बहुत बा । सन् १७७८ मे पल्लोकिरातके लिम्बुलोग भाषिक आन्दोलन कइलेरहे । सन् १९२४ मे काठमाण्डौके नेवारलोग भाषिक दवाव खातिर आन्दोलन कइलेरहे । सन् १९६५ मे भि भाषिक आन्दोलन चर्कइले रहे । सन् १९९१ मे नेपाल आदिवासी जनजाति संगठनके गठन भइलाके पश्चात इ संस्था जातिय पहिचानके आन्दोलन करत आइल बा । मातृभाषा, धर्म, संस्कृतिके विकास, संरक्षण आ सम्बद्र्धन करेखातिर धर्म निरपेक्ष राज्य घोषणा करेखातिर तथा सरकारी कामकाज आ शिक्षामे मातृभाषाके प्रयोग करेके मिलेके चाहि जइसन एकिकृत माग लेके अगाडी बढत गइल बा ।

इहे क्रममे काठमाण्डौ महानगरपालीका सरकारी कामकाजमे नेपाल भाषा, धनुषा जिविस तथा राजविराज नगरपालिकाद्धारा मैथिल भाषाके प्रयोग शुरु कइलापर सर्वोच्च अदालतद्धारा सरकारी कामकाजमे नेपाली भाषा बाहेक कवनो मातृभाषा प्रयोग करेनामिलि कहके फैसला कइलाके बाद जेठ १८ गतेके करिया दिवसके रुपमे भाषिक अधिकारकर्मी लेते आवत रहे । धर्मनिरपेक्ष मुलुक घोषणा भइलाके बाद इ दिन सडकपर विरोध प्रदर्शन करेके क्रम रुकल बा ।

नेपालके अन्तरिम संविधान, २०६३ के भाग ३ के मौलिक हकके शिक्षा तथा संस्कृति सम्बन्धि हक धारा १७.१ मे लिखल बा– प्रत्येक समुदायके कानुनमे व्यवस्था भइल बमोजिम आपन मातृभाषामे आधारभूत शिक्षा पावेके हक होई । एहितरे धारा १७.३ मे नेपालमे बसोबास करेवाला प्रत्येक समुदायके आपन भाषा, लिपि, संस्कृति, सांस्कृतिक सभ्यता आ सम्पदाके संरक्षण आ सम्बद्र्धन करेक हक होइ ।

आदिवासी जनजातिके अधिकार सम्बन्धि संयुक्त राष्ट्रसंघिय घोषणापत्र २००७, धारा १३.१ मे आदिवासी जनजातीसे ओकनीके आपन इतिहास, भाषा, मौखिक परम्परा, दर्शन, लेखन प्रणाली तथा साहित्यसब पुनर्जिवित करेके, प्रयोग करेके तथा भावि पुस्ताके हस्तान्तरण करेके तथा समुदाय, स्थान आ व्यक्तिके अपने नाम राखेके तथा ओकराके कायम राखेके अधिकार बा । नेपाल सरकारके अनुमोदन कइल अन्तर्राष्ट्रिय श्रम संगठन महासन्धि संख्या १६९ के कार्यान्वयन भइला पर मातृभाषाके संरक्षणमे सहयोग पुगी ।

अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवसके सन्दर्भमे सरकारी नियकायद्धारा एक दु दर्जन मातृभाषाके कविता वाचन कराके कुछो होएवाला नइखे । देशमे बोलेवाला मातृभाषा उ भाषाके वक्ताके खालि सरोकारके विषय ना ह, राज्यके हि अदृश्य सम्पदा ह । जे भाषा खराब होत जाता कहके चिन्ता करेला ओकराके खराब दृष्टि से देखल बुझल भ्रम ह । मुलुकके भाषा, संस्कृति, संस्कार, इतिहास बचावेके काम राज्यके ह । इ तरफ राज्यके ध्यान पुगल जरुरी बा । सरकारके भाषा निती नाभइलासे सय बर्ष बाद नेपालमे शायद डेढसय जेतना मातृभाषा बोललजातरहे जइसन उखान बनेके निश्चित बा । सबदिना बाचेखातिर हमनीके अपने भाषा जानेकेपडि जइसन तथ्यके तत्वबोध करके तथा करावेखातिर राज्यके अब बनेवाला नया संघिय गणतान्त्रीक संबिधानमे समेत प्रतिविम्ब करावल जरुरी बा ।

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1 thought on “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस”

  1. मातृभाषामा शिक्षा
    माताको दूध

    मातृभाषामा शिक्षा

    माताको दूध शिशुलाई शिक्षा मातृभाषामा,

    प्रभाव पर्छ सृस्‍टिलाई प्रकाशको गतिमा।.

    यी माथिका हरफ मेघालय शिलोंगका नेपालीभाषी पुस्तक ब्यबसायी श्री बिष्णु गौतमले बिगत ५ वर्ष देखि जोड तोडका साथ प्रचार प्रसार गर्दै आएका छन् । उनले प्रकाशन गरेका पुस्तक, बिजक, लेटर प्याड, पुस्तक सुची जताततै यी हरफ देख्न पाइन्छ । नेपाली, अंग्रेजी, खासी र बंगाली भाषामा लेखिएका यी हरफले मातृभाषाको शक्तिले सृष्टिको रक्षा र यस सुन्दर बहुरंगी विश्व-बाटिकालाइ द्रुत गतिमा सुमुन्नत बनाउन टेवा मिल्ने संदेश दिन्छ ।.

    जन्मेपछि सम्बाद गर्न सिकेको पहिलो भाषा नै मानिसको मातृभाषा हो । संसारमा ज्ञान, सोच र कल्पनाको बहुरंगी विविधता कायम राख्न पनि मातृभाषालाइ बचाईराख्न र विकास गर्न जरुरि छ । मातृभाषामा दिइने शिक्षाले सम्बन्धित भाषा त्यसको लिपि, जातीय संस्कार र संस्कृतिको विकास तथा समाजमा उत्प्रेरणा र चेतनाको अभिवृद्धि हुन्छ । यदि कुनै भाषा लोप भएर गयो भने त्यस जतिको संस्कृति पनि लोप भएर जान्छ । संस्कृतिक सम्वृद्धिमा सबैभन्दा ठूलो योगदान भाषाको नै हुन्छ । मातृभाषामा दिइने अभिव्यक्ति सबैभन्दा परिपूर्ण र सहज हुन्छ । यदि मातृभाषा सम्पन्न भयनन भने संसारमा धेरै कारोबार हुने सम्पर्क भाषाको अवस्था पनि खोक्रो हुन जानेछ । ससाना हजारौ मातृभाषाका कारणले नै संसारका सम्पर्क भाषा सम्पन्न र हराभरा भएका हुन् । यदि कारोबारी भाषामा लिप्त भएर मातृभाषाको लोप भयो भने ज्ञान बिज्ञानको संसार उराठिलो मरुभूमि जस्तो बन्ने छ । त्यसैले शिक्षा मातृभाषामै हुनु पर्छ । मातृभाषा मानिसको मौलिक ज्ञान, शिप सृजनाको खजाना हो । यस्तो महत्वपूर्ण खजानाको रक्षामा ध्यान नदिएर क्षणिक लाभको निम्ति कारोबारमा चलेका भाषामा मात्र लिप्त हुनु समाजको भविस्य माथि गरेको बेइमानी र बाल अधिकारको हनन हो ।.

    प्रसिद्ध साहित्यकार रवीन्द्रनाथ टैगोरले भनेका छन्, ‘मातृभाषामा शिक्षा पाउनु मानिसको जन्मसिद्ध अधिकार हो । हामी जसरी आमाको कोखमा जन्मेका हौं त्यसैगरी मातृभाषा पनि हाम्रो कोख हो । यी दुवै आमा हाम्रालागि सधैं सजीव र अपरिहार्य छन् ।’ उनले मातृभाषाको महत्त्वलाई बुझे र बुझाउने कोसिस गरे । प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ नेलसन मण्डेलाले भनेका छन्- इफ यू स्पिक टु अ म्यान इन अ ल्याङ्वेज ही अन्डरस्ट्यान्डस, इट गोज् टु हिज माइन्ड बट इफ यू स्पिक इन हिज ल्याङ्वेज इट गोज टु हिज हर्ट । यदि कसैसँग उसले बुझ्ने भाषामा कुरा गर्नुभयो भने त्यो कुरा उसको दिमागमा मात्र पुग्छ । यदि उसको मातृभाषामा भन्नुभयो भने मुटुसम्म पुग्छ । मण्डेलाले मातृभाषाको द्रुत असरलाई प्रस्ट्याए ।.

    विकासको क्रममा महत्त्वभन्दा वस्तुको कारोबारले त्यसको अवस्था निर्धारण गर्छ । जुन वस्तुको कारोबार बढी हुन्छ, संसारमा त्यसैको अवस्था बलियो हुन्छ । संसारमा अंगे्रजी भाषाको कारोबार धैरै हुन्छ त्यसैले कारोबार नहुने मातृभाषामा पढेर के फाइदा? हामीले पनि सुरुदेखि नै अंग्रजी भाषामा नानीहरूलाई शिक्षा दिने व्यवस्था मिलाएका छौं । हाम्रा ठूलाठूला विद्यालयमा एउटा नेपाली विषयबाहेक सवै विषय अंगे्रजी माध्यममा पढाइन्छ ।.

    संयुक्त राष्ट्रसंघको अध्ययनअनुसार यतिबेला कारोबारमा नचलेका करिब ५३०० मातृभाषा संकटमा परेका छन् । शिक्षामा मातृभाषाको महत्त्वलाई नजरअन्दाज गरेर अबको शिक्षानीति बनाइयो भने सामाजिक र राष्ट्रिय मात्र होइन मानव जातिकै अस्तित्व संकटमा आउन सक्ने स्थिति बन्नेछ । संयुक्त राष्ट्रसंघमा सन् १९९९ बाट यस मुद्दाले स्थान पाइसकेको छ । अब यसलाई संसारभरि उपयुक्त कार्यान्वयनको खाँचो छ ।.

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