भोजपुरी भाषा

डाह करे वाला (गजल)

डाह करे वाला अगाडि बढल होखे त कहS
स्नेह बाँटे वाला पिछाडी पडल होखे त कहS

टाँग खिचते रह जाई सब दिन टाँग खिंचे वाला
कामयाबी के सिंढी कहियो चढल होखे त कहS

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बाबा गणिनाथजी जिवन परिचय

ई भूलोक मे धर्मके रक्षा आ आपस के वैमनश्यता दुर करे खातिर परमपुज्य बाबा गणिनाथजी अवतार लिहनी । भारत देशके बैशाली जिलाके महनार गावमे श्री मंशारामजी गंगा नदी के किनारे आपन धर्म पत्नीके साथ रहत रही । दुनु प्राणीके कवनो संतान नारहे । भगवान शिवजीके भक्त मंशारामजी सात्विक विचारके रहनी आ आपन कवनो सामाजीक काम भगवान शिवजीके उपासना आ ध्यानमे मगन होके करत रही । भगवान शिवजी उनकर उपासनासे प्रशन्न होके एकदिन रातके सपनामे आके कहनी कि हे मंशाराम तोहर उपासना पुरा भइल । दोसर दिन मंशारामजी जंगलमे गइनि त देखनी कि एगो नवजात बच्चा पिपरके गाछि के निचा रहे जे मधुर मुस्कान विखेरत रहे आ ओकर माथासे अद्वितीय अलौकिक दिव्य प्रकाश चारु ओर फैल रहल रहे जेकर प्रभावसे गाछि से मध टपकल शुरु भईल आ मध सिधे लइकाके मुहमे गिररहल रहे आ लइका हस हस के मधुपान कररहल रहे । श्री मंशारामजी उ लइका के घरे ले अइले । लइकाके दिव्य शक्तिसे गांवके लोग आश्चर्यचकित रहे काहेकि उ लइका बचपने से आपन चमत्कार दिखावल शुरु कर देले रहे ।

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सालमे खाली एके बेर फुलावे वाला फुल

शिर्षक देखके रउवा लोग के जरुर आश्चर्य लागल होई बाकि बात एकदम सोह्आना सहि बा आ उहो इ होला तराईमे । पूर्वपश्चिम राजमार्गखण्डअन्तर्गत सिरहा जिल्ला के पडरिया चौकसे दक्षिणमे रहल ऐतिहासिक तथा प्राचीन फूलबारिमे अइसने फूल देखेके मिलेला । सलहेस फूलबारीके नामसे प्रसिद्घ रहल ई ऐतिहासिक फूलबारिमे प्रत्येक नयाँवर्षके दिन इहवा रहल हारमके गाछीमे सुनाखरी आकारके फूल फुलाला आ साँझतक मुरझा जाला ।

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नेपालमे भोजपुरी भाषा साहित्य के विकाश

प्राचिनकाल से भारत बिहार, के भोजपुर, आरा, बलिया, छपरा, सिवान, गोपालगंज आ उतर प्रदेशके जनपद जिलाके भाजपुरी भााषा, नेपार९भारत के नारहके अब अन्तरराष्ट्रिय भोजपुरी भाषा होगइल बाटे । वर्तमान मे नेपाल, भारत, मौरीसस, फिजी द्दिप समुह, ट्रिनीडाड, सुरिनाम, गुआना, मलेशिया लगायत अउरी देश मे भि बोलचाल के रुपमे प्रचलीत होगइल बाटे ।

अमेरीका के हार्ड९वर्ड युनिभारसिटी कालेज मे भोजपुरी भाषा सिखावे के व्यवस्था कइलगइल बाटे ।भोजपुरी भाषा आ संस्कृतिके बारेमे सयकडो किताब अंग्रेजी भाषामे वेलायतमे बहुत पहिले जब ब्रिठिस शासक भारत मे साशन करत रहे ओही कालमे छपल किताब के प्रेरणा से आज अंग्रेज लोग भोजपुरी भाषा साहित्य कला के खोज के प्रति रुची राखेला ।

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सेनामे मधेसी

सेनामे मधेसीके पहुच रोके खातिर पुरातनवादी, यथास्थितिवादी षडयन्त्रकारी गैर मधेसी समुदाय जीतोडके नया नया विवाद, बहस आ बखेडा सिर्जना करमे आपन दम लगादेले बा । का इ उचित ह ? एकर विश्लेषण कइल बहुत जरुरी बा । डा. बाबुराम भट्टराईके सरकार मधेसीके नेपाली सेनामे भर्ना करेके घोषणा कइलाके बाद इ सरकारी नीतिके विरोधमे षडयन्त्रकारी गैर मधेसी आपन पुरा जान लगादेले बा । तनी इलोगके तर्क के सम्बन्धमे चर्चा कइलजाव, विभिन्न पत्रपत्रिका आ भाषणमे कहल बातके उल्लेख करतानी ः
(१) मधेसवादी दलद्वारा प्रधानमन्त्रीके दबाब देलाके परिणामस्वरूप सरकार सेनामे अलग मधेसी बटालियन भर्ना करेके निणर्य कइले बा ।

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मधेस आ मधेसी

चैत्र २२ गते २०६९, वियफेके दिन प्रकाशित राष्ट्रिय समाचार पत्र कान्तिपुरमे प्रकाशित एमाले नेता रघु पन्तके मधेस, देश र परदेश नामक लेखके सन्दर्भमे आपन स्वतन्त्र विचार व्यक्त करेके चाहतानी नेपाली राजनीतिमे जउन पार्टी सरकारमे गइल उ आपन कामके बढिया आ उच्च महत्व देवेला आ विरोधी पार्टी ओकर कामके खराब आ देश विरोधी कहके अपन राजनीति जारी रखेला । का ई बात ठिक बा ?

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नववर्ष मङ्गलमय होखो

सर्वत्र नेपालमे नववर्ष मङ्गलमय पर्वके रूपमे मनावेके प्रचलन रहल बा । नववर्षके दिन सबेरे नहाधोवाके आपन इष्टदेव, देवीके पूजा आराधना करके दोस्तलोगसे शुभकामना आदानप्रदान तथा मान्यजनलोगसे आशीष लेके मीठ खाना खाके आराम करके मनावलजाला । कोही कोही साथीभाइलोग मिलके वनभोज करके भा कवनो दर्शनीय ठावके भ्रमण करके भि नववर्ष मनावल करेला । नववर्षके दिन सरकारी छुट्टी होला ओहिसे नववर्ष निमने तरिकासे मनावल जाला । नववर्षके उपलक्ष्यमे तराईके जिल्लनमे कहि कहि मेला आ महावीरी झण्डा भि लागेला । कुस्ती, दङ्गल आ भेडाके लडाइ कराके भि नववर्षके दिन मनोरञ्जन कइलगइल मिलेला ।

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मिथिला पञ्चकोशी परिक्रमा मेला

साधुसन्तके काँधपर मिथिला बिहारीके डोला, अउर तीर्थयात्रीके मुडीपर राशन पानीके पोका आ झाल, ढोलक, डमरुके करतल ध्वनिके साथ सीतारामके भजन करेवालनके लाइन केकरो केभि मोहित कर रहल बा ।

इ दृश्य ह – बृहत् मिथिला पञ्चकोसी परिक्रमा मेलाके श्रद्धालुलोगके । अनेकतामे एकताके विशिष्ट उदाहरणके रूपमे रहल पन्ध्रदिनके इ परिक्रमा मेला फागुन प्रतिपदासे शुरू होके पूर्णिमाके दिन सम्पन्न होला ।

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ध्वनि प्रदूषण

भोरमे मधुर आवाज अइलापर आनन्द नामानेवाला आदमी कमे होइ । आदमीयेना सड्डीत तथा मधुुर ध्वनिमे प्रकृतियो आनन्दमय होला । आजकाल उन्नत तरिकासे गाईभइस पोसेवाला कृषकलोग गोठमे देवीदेवेवताके भजनवजावल करेला । गोठके विभिन्न स्थानमे साउन्ड बक्समार्फत् मधुर आवाजमे भक्ति गीत एवं धुन बजलापर चौपायाभि आनन्दसे आपन आहार खाएके, आपसमे झगडा नाकरेके आ दूध ज्यादा देहल करेला वैज्ञानिकलोगभि प्र्रमाणित कचुकलबा । गीतके शब्द नबुझेवाला भि भक्ति गीतके सड्डीत तथा धुनमे मस्त आनन्द लिह सकेला । जेतरे मन्दिरके घण्टाके आवाजमे कर्र्कश ध्वनि नाहोला । उ मधुर, कर्र्णप्र्रिय आ आनन्दमयी होला ।

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मुद्रा

“मुद्रा” जेकरा के हमनी लेनदेन के भाषा मे रुपया, पैसा, कहेनिसन एकरा बारेमे जानकारी लेहल बहुत हि जरुरी बा । काहेकी आजकाल जइसन भौतिकबादि युग मे एकर महत्व बहुत बढ गईल बा ।

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अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस

अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस २१ फरवरीके मनावल जाला । १७ नवंबर, १९९९ के यूनेस्को एकर स्वीकृति देलेरहे । इ दिवसके मनावेके उद्देश्य विश्वमे भाषा, सांस्कृतिक विविधता आ बहुभाषिताके बढावा देवेके ह । यूनेस्कोद्धारा अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवसके घोषणासे बांग्लादेशके भाषा आन्दोलन दिवसके अन्तर्राष्ट्रीय स्वीकृति मिलल, जउन बांग्लादेशमे सन १९५२ से मातृभाषा (बंगाली भाषा) बोलेके अनुमति देवेके पडि कहके माग करेवाला विधार्थी मारलगइल दिनके संस्मरणमे इ दिवस मनावत आइलजात रहे । ओहसमय बंगलादेशके पूर्वी पाकिस्तान कहलजात रहे । बांगलादेशमे इ दिन एक दिनके राष्ट्रीय छुट्टी दिहलजाला ।

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ए हमर बाबु तनि करके त देख (मनोविश्लेषण)

१. भोरे उठके धरती माताके प्रणाम करी, मातापिताके प्रणाम करी । मातापिताके कष्ट दिहलजाई त दुःखी रहम । सुख दिहम त हमेशा अगाडि बढम ।

२. माताके सेवा करी, प्रसन्न रखि, तीर्थयात्रा, देवपूजन–सब पूरा होइ । बाहरसे अइलापर माई मुह देखेलिन सन्तान भुखे बा कि, बाकि परिवारकेलोग हमराला कथि लियवले बाडन उ देखेला ।

३. जीवनमे सत्यसे बडका कवनो धर्म नइखे । सदा सत्य बोलेके चाहि । सत्य–भाषणसे अपार शक्ति प्राप्त होला ।

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बसन्त पञ्चमी

माघ शुक्ल पञ्चमीके दिनके बसन्त पञ्चमी कहलजाला । इ दिनके वाणीपूजा, वागीश्वरी पूजा तथा सरस्वती पूजनोत्सवके रूपमे मनावलजाला । इहे दिन रतिकाम महोत्सव, आम्रमञ्जरी भक्षण महोत्सव तथा लेखनी पूजन महोत्सव भि विभिन्न जगहमे मनावल गइल मिलेला । हमनीके देशके पहाड तथा तराई दुनु ठावमे खासकके वाग्देवी सरस्वतीके पूजनोत्सव धूमधामसे मनावल जाला । खासकके विद्यालय तथा क्याम्पसनमे सरस्वती पूजनोत्सवके तयारी प्रायः माघ महिनाके शुरूवेसे कइलजाला । स्कूलके विद्यार्थी खातिर इ पूजन उत्सवके रूपमे मनावल गइल मिलेला । माघ शुक्ल पञ्चमीके दिन विद्यार्थीलोग सबेरे उठके नहाधोवाके अगरबत्ती, पुष्पगुच्छा तथा अन्य पूजन सामग्रीलेके आ–आपन

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डुलडुल घोडा

विगत एक दशकसे नादिखल डुलडुल घोडाके नाच माघ २६ गते सिम्रौनगढ मे देखेके मिलल । इ नाच शहर बजारमे त लोप होइये गइल बा बाकि गाव–गाव मेभि डुलडुल घोडाके नाच दिखल छुट गइलरहे । कुछ दिनसे सिम्रौनगढ क्षेत्रमे पुनः इ नाच दिखे लागल बा जेसे ई क्षेत्रके गावनमे डुलडुल घोडा नचावल शुरू भइलासे गावके लइकनमे खुशीयाली भइल बा ।

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आपन पराया

“तनी रास्ता छोडेम” आवाज कानमे पडते ही विभा अपन तंद्रासे जाग उठली । एगो महिला आपन गर्भवती बेटीके संगे उन्का कोच के तरफ आवत रहली । विभा एक अंगडाई लेलीन आ आपन नयां सहयात्रीलोग के तरफ देखे लगलीन ।

गर्भवती महिला के सायद आठ या नव महिना चलरहलरहे । आपन भारीभरकम शरीरके बडा मुश्किलसे संभालते अपना खातिर स्थान बनावत रहली । उनकर माईके आखनमे उनका प्रति कोफतके भाव साफस्पष्ट रहे । कोचमे ६ लोग खातिर सीट होखेला बाकी सीटके उपर दाया बायां एतना ना सामान फैलल रहे कि लागत रहे सारा शहरके लोग इहे डिव्बा मे सवार होखेवाला बा ।

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भिखारी

सांझ के समय रहे, नया सिजनके लिचि आ आम बजारमे एक दु दिनसे खुबे आवे जेसे बजार मे अउरी दिनके तुलना मे तनी भिड जादा होजात रहे । हरिहर तरकारीसे त बजारे भरल रहे ।

एकजने साहेब बहादुर अपन पत्नीसंगे तर–तरकारी किने मे लागल रलन । एतनेमे एगो लङ्गड भिखमंगा उहा पहुचल आ भिख मागेलागल । उ रह रहके औरतसे कुछ पैसा देवेके आग्रह करत रहे । बाकि साहेब बहादुर के औरत मुह करवाईन बनाके मंहटिया देत रलिन ।

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शोषण

कवनो वस्तुके रस खींचिके अपनावल क्रिया के हि शोषण कहल जाला । समय, काल आ परिस्थिति अनुसार शोषण करेके तरिका बदल गईल बा बाकि शोषण करेवाला संस्कार नइखे बदलल । पहिले मालिक मजदूर के साथ शोषण करत रहे त अब मजदूर मालिक के साथ शोषण करता । शोषणके बोलबाला चारुओर बा । राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक जइसन हरेक क्षेत्रमे शोषण के राज बा । जेकरा लगे तनि पावर आ जाता उ अपनासे छोट के शोषण करे लागता । समयके चक्र जइसे घुमेला ओइसहि शोषित व्यक्तिके दिमागो घुमेला जेकर परिणाम समाजमे अशान्ति फैलजाला । प्राकृतिक गुण अनुसार हरेक व्यक्तिमे कुछो ना कुछो खुबी जरुरे रहेला ।

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नेपालके राजनीति आ राष्ट्रपति

मुलुकमे एहबेरा चारगो शक्ति बा । सरकार, विपक्षी दल, राष्ट्रपति कार्यालय आ नागरिक समाज । ई चारु शक्ति मिलके निकास देवेके उल्टा एहबेर चारु शक्ति चारो दिशामे खडाभइल बा । चारु शक्ति चारओरी रहलासे गतिरोध जटिल बन्ते जारहल बा । ई चारो शक्तिके वर्तमान भूमिका देखलापर सरकार आपन कुर्सी बचावेमे लागल बा त विरोधी दललोग केतरे सरकार बनावल जाव जइसन सत्ता स्वार्थमे लागल बा । नागरिक समाज मौन धारण कइले बा त राष्ट्रपति विभिन्न पक्षलोगसे सल्लाह करत आपन भूमिका पहिचान करेमे लागल बाडन ।

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छठ पर्व

भगवान सूर्य/भासकर के उपासना के महान पर्व ह छठ । मूलतः सूर्य षष्ठी ब्रत भइलाके कारण इ पर्वके छठ कहलजाला । पारिवारीक सुख–समृद्धि आ मनोवांछित फल पावे खातिर इ पर्व मनावल जाला । पुरुष आ महिला दुनुकोई समानरुपसे इ पर्व मनावेला । छठ ब्रतके सम्बन्धमे अनेक कथा प्रचलित बा, ओमेसे एक कथाके अनुसार जब पान्डव आपन सारा राजपाट जुवामे हारगइल तब द्रौपतीजी छठ ब्रत कइलिन । तब उनकर मनोकामना पुरा भइल आ पान्डवके आपन राजपाट फिर्ता मिलगइल । लोकपरम्पराके अनुसार सूर्य देव आ छठी मईया के सम्बन्ध भाई–बहिनके ह । लोक मातृके षष्ठी के पहिलका पूजा सूर्यदेव हि कइले रनी ।

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