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लघुकथा साहित्य

कुकडु कु (लघुकथा)

‘कुकडु कु!’ मुर्गा बाँग लगाकर लौटता हुआ मुर्गी को बोलने लगा, ‘देखा भाग्यवान! मेरे ही कारण इन सब लोगोँ के काम बनते हैँ। नीँद में मस्त इन मूर्खों को समय का महत्त्व का क्या पता।’

‘हाँ, हाँ तुम्हारे ही कारण यह सब चलता है। सुबह की थोडी सी झपकी भी लेने नहीं देते।’ मुर्गी गुस्से से झुँझलाई।

‘और क्या? और सुनती हो? सूरज भी मेरे बाँग लगाने से ही उगता है,’ मुर्गा गर्व से फुदकता हुआ बोला।

‘ज्यादा मत फुदको। लोगों के भोजन बनोगे, फिर पता चलेगा,’ मुर्गी उसको समझाने लगी।

दुश्मन (लघुकथा)

मेजर साहब का सबसे बडा दुश्मन था वह। उसने मेजर साहब की रातों की निंद और दिनोँंका चैन सब छिन लिया था। देर रात तक उसी के आवाज के कारण वह अच्छी तरह सो भी नहीं सकते थे । दिनभर भी उसी की सोच उन की दिनचर्या को प्रभावित करती थी।