मैथिली भाषा

पाँच मुक्तक (खेलबै होरी)

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SudhaMishra

१) खेलबै होरी नव नुवामे
भरिक सिनेहिया मीठ पुवामे
खेलबै होरी हम नव नुवामे
चलि आऊ प्रीतम गाम अपन
अनुराग सजोनेछी मनुवामे

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बुढेसक थेघ (मैथिली कथा)

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वृद्धाश्रम आ अनाथ आश्रमक चर्च छोटेसँ गप्पक क्रममे सुनैत छलहुँ । उमेरकसँग मोनमे एकटा उत्कण्ठा होइत रहल ओही ठाम जाकऽ ओतुका वास्तविक स्थिति देखवाक ।

आखिर अपना लोकसँ तिरस्कृत व्यक्तिकेँ ओही ठाम केहन अवस्थाक सामना करए पड़ैत छन्ही ।

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हमरो वर चाहिँ हरहर महादेव

  • by
SudhaMishra

नहि चाहिँ मोरा सीताके राम सन
नहि चाहि मोरा राधाके श्याम सन
नीक लगैय हमरा गौराके प्राणनाथ
चाहिँ पतिदेव हमरो भोलेनाथ

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trandate

समझौता

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एहेन पञ्चैती एहिसँ पहिने गाममे कहिओ भेल होए, से मोन नही पडिरहल छैक ककरो । गाममे एहेन विकट समस्यो पहिने कहिओ उपस्थित भेल हो, से गामक सबसँ बूढ आ परोपट्टाक प्रतिष्ठित व्यक्ति भुटकुन मुखियाकेँ सेहो स्मरण नही छैन्ह ।

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चार मुक्तक (हमरो निंद कहाँ ?)

  • by
SudhaMishra

१) हमरो निंद कहाँ ?

जागल रहलौ अँहा तँ हमरो निंद कहाँ ?
व्यक्त कलैछी अँहा हमरा शब्द कहाँ?
बिन डोरेके कसल इ मजगुत गिरह
बिनु अँहाके धडकने हमरो साँस कहाँ?

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SiyaramKumarDas

मिथिलाक किसान

हम छि मिथिलाक किसान, किसानी हमर काम यौ
करैत छी माइटक पूजा, माइट हमर प्राण यौ
मानैत छी माइटक अपन भगवान यौ
हम छी मिथिलाक किसान, किसानी हमर काम यौ ।

होयत वर्षा तब धोती, कुर्ता, पाग लगायब यौ
हर, कोदाइर सङ्ग खेतमे पसिना बहायब यौ
रोटी, चटनी जलखै खायब यौ
हम छी मिथिलाक किसान, किसानी हमर काम यौ ।

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ठंडीक एक कप गरम चाय

ठंडीक एक कप गरम चाय
देखिक ओकरा मोन मुसिकाय
छुवन सँ ओकर तन झुमिजाय
ठंडीक एक कप गरम चाय

छुवन सँ ओकर मचलल ठोर
ससरि हृदयमे कयलक भोर
अँग अँग गुदगुदायल मोर
खुशीक नहि अछि कुनो ओर

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20210105_UshaThakur-Lekh

विनीत रचित मैथिली हाइकु पर एक विहंगम दृष्टि (समिक्षा)

विनीत ठाकुर निरन्तर क्रियाशील स्रष्टाक रुप मे एकटा परिचित तथा चर्चित नाम अछि । एहि क्रम मे ओ मैथिली हाइकु संग्रह लऽकऽ पाठक समक्ष प्रस्तुत भेल छथि । हुनक एहि कृति मे कुल १०० हाइकु संग्रहीत अछि ।

हाइकु के संग–संग ओ कविता, कथा, गीत, लेख, निबन्ध आदि विधा मे कलम चलाबऽ मे क्रियाशील छथि । मैथिली आओर नेपाली साहित्य जगत् मे हुनक बहुआयामिक साहित्यिक व्यक्तित्व खूब लोकप्रिय छनि ।

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धूर अहा बरद छी (मैथिली व्यङ्ग्य कविता)

दोसरेके लेल बहब,
खुट्टामे बानहल रहब,
कुट्टीसानी लेल टुकुर–टुकुर ताकब,
मलिकवाक दाना लेल कच्छर कातब,
डिरिएबाक आदत बनाएब,
तिरपित ओहीमे रहब,
झुठ नई छै शनिश्चराक कहब–
धूर अहा बरद छी ।१।

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मिथिला मधेशक पावनि छठि

गाम समाज, एकही ठाम पुजे
छठि पावनि, बड विशेष छै
डुबैत सुरुजसँग, उगैतके पुजब
अही पावनिके, दिव्य सन्देश छै

ब्राह्मण क्षेत्री वैश्य हरिजन
अर्घ देवलाय, सँगसँग ठार छै
नर नारी जवान वृद्ध सभकेउ
परमेश्वरीके, करैत प्रणाम छै

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भरदुतिया (लघुकथा)

भरदुतियाक दिन छलै । भोरे सबेरे सब गोटे उठि आहारबहार निकललै । एने गोपाल सुतले छलै ।

माइः (आवाज लगेलकै) ‘बाउ, बाउ रे बाउ!गोपला छी रै? भोर नै भेलै ?’

गोपाल: आँहि.., (ऐँठी मारैत) , हँ उइठ गेलियै ।

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मिथिलाके दानापानिए बताह छै

जकरा भेटल बन्दुक सेहा हबलदार छै,
दोसरके अल्पज्ञानी अपनेटाके सर्वज्ञानी मानै छै,
गुण-दोषके पहिचान नई छै,
आत्मप्रशंसा गत्तर-गत्तर भरल छै,
डेग डेग सर्वेसर्वाके अभिमानी छै,
ठोप-कमण्डल बड भारी छै,
मिथिलाके दानापानीए बताह छै ।

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20201202_RambharosKapariBhramar-Lekh

हाइकु अन्तरिक्षक एकटा नव उपग्रह : वसुन्धरा

गढिकऽ रचना करब हमरा कहियो नीक नहि लागल । हम ओहन रचना के गढ़ब बुझैत छी जाहि मे लेख्य अनुशासनक बात कहल जाइत होइक । यथा गजल लेखन, कोनो विशेष अवसरक गीत लेखन आ कविता लेखन । आब त तेहने काव्य अनुशासनक परिधि मे रहि नव प्रयोग हाइकु लेखन आयल अछि ।

मैथिली भाषाक क्षेत्र मे सेहो हाइकु बेस लोकप्रिय भेल जा रहल अछि । जापान सँ आएल ई काव्य विधा हिन्दी, नेपाली होइत मैथिली भाषा मे सेहो प्रयोग होमय लागल अछि । एहि विधा के पुस्तकाकार प्रकाशन होइत अछि ।

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दुर जो कोनाक बेमत भेल छी ?

दशमीबाट तकिते बितल कोजगराक चान उगादीय
फुल हमर फुलल अछि आबि अँहा आँगन गमकादीय

धोती कुर्ता गमछामे अँहा लगबै जेना नवका वर यो
ललितगर नुवा पहिर हमहु बटबै पान मखान यो

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ShyamPritMandal

ललका बेल्ट (मैथिली कथा)

~माए गै ! हमहूँ हटिया जेबै !
~से किया रे ? नइँ जो, साँझ पैड गेलै, दोसर दिन जाइहें । हे तोराल’ हम जलखै नने एबौ, फोँफी सोहो नन’ लएबौ ।
~नइँ जोऽऽ, हम जेबेऽ करबै । नाइँ, नाइँ, नाइँ….. । (काइनते काइनते)
~ मर, नै कान न’ रे । आब कि करबै ? कमलपुर बाली हमरा खातिर रूकल हेतै । ले,ले चल चुप हो, चल । पहिलैये लेट भ’ गेलै ।

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KarunaJha

बुढापा (बृद्धावस्था)

व्याकुल भ हमर मन
पुछि रहल भगवान सँ
किया भटकि गेल मानव
आई अपन इमानसँ ।
बृद्ध भेनाई कोनो पाप नहि
तइयो ई विषक प्याला अछि
वृद्ध क खातिर कोनो सन्तान
आई समय नई निकालत अछि ।

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