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दिनेश यादव

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लुंगी आ धोती (मैथिली कविता)

जाड सँ बचबाक लेल लुंगी पहिर घुर तर बैसल छी,
हावा बहिते धूवाँके आज्ञापालक बनि जाइत छी,
तईं कहियो पूरब त कहियो पश्चिम दिसि माथ घुमा लइत छी,
पछिया बहिते लुंगीके ओढना सेहो बना लइत छी ।

सियौऊवा डाढिबाला फाँटल पैन्ट डाँढमें लटकौने छी,
कोठारी पहिरब आशमें झालरबाला सैन्डो पहिरने छी,
सिट–सिट हावा बहिते थर–थर कपैत छी,
कखनों लुंगीके ओढना सेहो बना लइत छी ।।

धुआ धोती लगबैवाला सब हिटर तपैत देखने छी,
कर्सीबाला घुरक बात सेहो ओ सब करैत सुनने छी,
मुदा धोतीके ओढना बनाओल नहि देखने छी,
पूर्वा बहिते लुंगीके ओढना बना लइत छी ।।।

लुंगीके गाँति बन्हने बौआबुच्चीके देखने छी,

धनपति काका

कोरोना भाइरसको सम्भावित सङ्क्रमण रोक्न सरकारले लकडाउन गरेको छ । लकडाउनले ज्याला/मजदूरी गर्नेहरुको चुलो बन्द भएको कयौं दिन भइसक्यो । सरकारले राहत दिने हल्ला चलाएसँगै नाम लेखाउनेहरुको तछाड–मछाड शुरु भयो । हुनेखानेले समेत आ–आफ्नो नाम लेखाएका छन् । कतिपय स्थानमा राहत बाँड्न थालेपछि झडप र हानाहान समेत भएको छ । हाम्रा गाउँका छिमेकी धनपति पसले काका पनि राहत पाउँने दौडमा सामेल भएका छन् । उनी गाउँकै धनपतिमध्येमा पर्छन् । अहिले पाको उमेरका कारण उनी मरणासन्न अवस्थामा छन् । जीवनभरि उनी धनकै लागि दौडधूप गरिरहे । जीवनको अन्तिम अवस्थामा पनि उनलाई धनकै चिन्ता थियो । अँझ, सरकारी राहत पाए हुन्थ्यो भन्ने चाहना उ

DineshYadav

मैथिली संस्कृतिमे ऋतु

विषय प्रवेश:
‘ऋतु’ शब्द ‘ऋत’ सँ बनल अछि । ई ज्ञानक परम्पराक एकटा विशिष्ट पारिभाषित शब्द थिक– एकर आत्यंतिक अर्थ होइछ– ‘अस्तित्व अर्थात् चराचर सत्ताके संचालन करैवाला परम नियम ।’ एहन नियम जेकरा, कियों बनबैत नई छहि, मुदा अस्तित्वक सत्तामें ई अपने आप समाहित अछि । समय आ जीवनमें ‘संस्कृति’क रचना मनुख करैत छहि । प्रकृतिक चक्रमें ऋतु अबैत अछि– लोक ऋतुसँ जुडल पर्व–त्यौहारक रचना कएलक अइछ–पर्व–त्यौहारक देवता आ पूजा–अनुष्ठान, पर्वसभके संगैह नृत्य आ गीत, चित्र आ शिल्प, विश्वास आ लोकाचार स्थापित भेल अछि (तिवारी, सन् २००९) । तईं ‘लोकक ऋतुगीत प्रकृतिके सुन्दरता, पर्व–त्यौहारक ‘मंगल अवसर’ आ ‘संस्कृतिके रचना उत्सव’ संगैह अछि ।