मैथिली संस्कृतिमे ऋतु
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‘ऋतु’ शब्द ‘ऋत’ सँ बनल अछि । ई ज्ञानक परम्पराक एकटा विशिष्ट पारिभाषित शब्द थिक– एकर आत्यंतिक अर्थ होइछ– ‘अस्तित्व अर्थात् चराचर सत्ताके संचालन करैवाला परम नियम ।’ एहन नियम जेकरा, कियों बनबैत नई छहि, मुदा अस्तित्वक सत्तामें ई अपने आप समाहित अछि । समय आ जीवनमें ‘संस्कृति’क रचना मनुख करैत छहि । प्रकृतिक चक्रमें ऋतु अबैत अछि– लोक ऋतुसँ जुडल पर्व–त्यौहारक रचना कएलक अइछ–पर्व–त्यौहारक देवता आ पूजा–अनुष्ठान, पर्वसभके संगैह नृत्य आ गीत, चित्र आ शिल्प, विश्वास आ लोकाचार स्थापित भेल अछि (तिवारी, सन् २००९) । तईं ‘लोकक ऋतुगीत प्रकृतिके सुन्दरता, पर्व–त्यौहारक ‘मंगल अवसर’ आ ‘संस्कृतिके रचना उत्सव’ संगैह अछि ।
