श्यामपृत मण्डल

भरदुतिया (लघुकथा)

भरदुतियाक दिन छलै । भोरे सबेरे सब गोटे उठि आहारबहार निकललै । एने गोपाल सुतले छलै ।

माइः (आवाज लगेलकै) ‘बाउ, बाउ रे बाउ!गोपला छी रै? भोर नै भेलै ?’

गोपाल: आँहि.., (ऐँठी मारैत) , हँ उइठ गेलियै ।

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ShyamPritMandal

ललका बेल्ट (मैथिली कथा)

~माए गै ! हमहूँ हटिया जेबै !
~से किया रे ? नइँ जो, साँझ पैड गेलै, दोसर दिन जाइहें । हे तोराल’ हम जलखै नने एबौ, फोँफी सोहो नन’ लएबौ ।
~नइँ जोऽऽ, हम जेबेऽ करबै । नाइँ, नाइँ, नाइँ….. । (काइनते काइनते)
~ मर, नै कान न’ रे । आब कि करबै ? कमलपुर बाली हमरा खातिर रूकल हेतै । ले,ले चल चुप हो, चल । पहिलैये लेट भ’ गेलै ।

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