सुधा मिश्र

मासुमक कसुर कहिदिय हे विधाता

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SudhaMishra

पिता जिनका कहल जाति छै अहिठाम साक्षात् भगवान
तहन ओ अपने जन्माओल सँ एना किए छथि अंजान?
बुझल नही छनि जिनका कनियो ककरा कहैछै नाता?
तखन ओहन मानुष किए बनैछथि किनको जन्म दाता?

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मोन मोर हरियाल अछि

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SudhaMishra

बागबोन हरिएर गाछ वृक्ष हरिएर
माटिक हरियरी सँ नभ भेल हरिएर
हरिएर नुवामे मोन मोर हरियाल अछि
हरिएर पिएर चुरिक खनक कमाल अछि

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चार मुक्तक (हे नुतन वर्ष)

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SudhaMishra

हे नुतन वर्ष

हे नूतन वर्ष नवीन उमंग लअबिहा
जीवलेल जीवके नव तरंग लअबिहा
जुरेबा तुहु जुरायल देखि धरती गगन
कलशमे सजाक प्रह्लाद प्रसंग लअबिहा

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पाँच मुक्तक (खेलबै होरी)

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SudhaMishra

१) खेलबै होरी नव नुवामे
भरिक सिनेहिया मीठ पुवामे
खेलबै होरी हम नव नुवामे
चलि आऊ प्रीतम गाम अपन
अनुराग सजोनेछी मनुवामे

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हमरो वर चाहिँ हरहर महादेव

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SudhaMishra

नहि चाहिँ मोरा सीताके राम सन
नहि चाहि मोरा राधाके श्याम सन
नीक लगैय हमरा गौराके प्राणनाथ
चाहिँ पतिदेव हमरो भोलेनाथ

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चार मुक्तक (हमरो निंद कहाँ ?)

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SudhaMishra

१) हमरो निंद कहाँ ?

जागल रहलौ अँहा तँ हमरो निंद कहाँ ?
व्यक्त कलैछी अँहा हमरा शब्द कहाँ?
बिन डोरेके कसल इ मजगुत गिरह
बिनु अँहाके धडकने हमरो साँस कहाँ?

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ठंडीक एक कप गरम चाय

ठंडीक एक कप गरम चाय
देखिक ओकरा मोन मुसिकाय
छुवन सँ ओकर तन झुमिजाय
ठंडीक एक कप गरम चाय

छुवन सँ ओकर मचलल ठोर
ससरि हृदयमे कयलक भोर
अँग अँग गुदगुदायल मोर
खुशीक नहि अछि कुनो ओर

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मिथिला मधेशक पावनि छठि

गाम समाज, एकही ठाम पुजे
छठि पावनि, बड विशेष छै
डुबैत सुरुजसँग, उगैतके पुजब
अही पावनिके, दिव्य सन्देश छै

ब्राह्मण क्षेत्री वैश्य हरिजन
अर्घ देवलाय, सँगसँग ठार छै
नर नारी जवान वृद्ध सभकेउ
परमेश्वरीके, करैत प्रणाम छै

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दुर जो कोनाक बेमत भेल छी ?

दशमीबाट तकिते बितल कोजगराक चान उगादीय
फुल हमर फुलल अछि आबि अँहा आँगन गमकादीय

धोती कुर्ता गमछामे अँहा लगबै जेना नवका वर यो
ललितगर नुवा पहिर हमहु बटबै पान मखान यो

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अपने औथिन गाम (मैथिली कविता)

आब शरद्क ऋतु आगमनके एहसास होइय
बढी जाइय खुशी आनन्दके आभास होइय
वितरहल विरहक घरी अपने औथिन गाम
बाट जोहैत चञ्चल नयन करतै आब आराम

उथल पुथल अखने सँ मचि गेल अही मोनमे
सुरुजक किरण सेहो कहैय बहुत किछु भोरमे
नही बसमे किछुओ हमर धडकन छ‌ै बेहाल
शेष रहितो चारि दिन मचा रहल छै उदफाल

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ने कहके आँट रखैत छी (मैथिली गजल)

भुलि नई सकैछी ने कहके आँट रखैत छी
मोन ही मोन सही बहुत याद करैत छी

व्याकुल होइछी जखन देखलाय सुरतके
अँहाके डि.पी. के जुम कय कअ देखैत छी

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मधुर मिलनके आस यो (मैथिली गजल)

हरियर सारी हरियर चुरी हरियर छैक मास यो
मास छैक मधुमास इ मधुर मिलनके आस यो

दुर रहब नहि उचित अपन कनियाँ वियाही सँ
लौटु अपन मरैयामे कते हमरा करब उदास यो

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