मैथिली भाषा

केहेन उजाड जँका (गजल)

केहेन उजाड जँका सुनसान देखैछी
मात्र पत्थरे छै कहाँ भगवान् देखैछी ?

नाम जपिक खाइबला भेलै बुद्धिमान्
भ्रष्ट पदलोलुप मात्रे महान् देखैछी ।
केहेन उजाड जँका सुनसान देखैछी
मात्र पत्थरे छै कहाँ भगवान् देखैछी ?

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20150904_BinitThakur-Poem

जाइतक टुकरी

जाइतक टुकरी नै ऊँच–नीच महान्
छी हम सब मैथिल मिथिला हमर शान

होइ छै एकेटा धरती एकेटा आकाश
पिवैत छी सबकिओ एकेटा बतास
चाहे ओ पंडित हो, पादरी आ खान

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20150802_BinitThakur_poem

गाम–नगर में

गाम–नगर में सोरसराबा सुनल गेल बड़ बेसी ।
लोकतन्त्र में अपन अधिकार लऽकऽ रहत मधेशी ।।
जनसंख्या सँ जनसागर में जोरल छलौं हम सीधा ।
खाकऽ हमहुं लाठी गोली पारकेलौं सबटा बाधा ।।

बटवृक्षक अंकुर बनि जनमल कतेको आशा ।
लतरल चतरल मधेस मे हेतै नै कतौ निराशा ।।
जाइत पाइत में नै ओझराकऽ चुनब असली नेता ।
विकास में लिखत नव ईतिहास मधेसक बेटा ।।

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20150718_BinitThakur_poem

जे करथि घोटाला

जे करथि घोटाला छथि अखन बोलबाला
चलत कोना ई दुनिया कह रे उपरबाला

गाम–नगर में बैइमान वनमे घुमै सैतान
मानब भऽ दानब वनि करै सज्जनक अपमान
आब सज्जनक बस्ती सब बनिगेल बधशाला

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20150702_BinitThakur_poem

कम्प्यूटरक दुनिया (मैथिली कविता)

ईन्टरनेट, ईमेल कम्प्यूटर के दुनिया ।
च्याटीङ्ग पर भेटल हमर ललमुनिया ।।
नाम ओकर भाई जेहने छै अलका ।
तेहने ललितगर केश ओकर ललका ।।

च्याटीङ्गसँ शुरुभेल नीक प्रेम कहानी ।
वेभलेन्सक सामने लागे रुपक रानी ।।
हलका लिपिष्टिक गोल गोल मुखड़ा ।
लागे ओ जेना हँसैत चानक टुकड़ा ।।

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शान्ति सन्देश

ए ! शान्तिदूत परवा उड़िकऽ आ अप्पन देशमे
फैलऽवै तों शान्ति हिमाल, पहाड़ आ मधेशमे
एतऽकेँ सभ नर–नारी अछि शान्तिकेँ पूजारी
सहत कोना हिंशा पसरल अछि समस्या भारी

हिमालक अमृत जलमे मिलिगेल शोनितकेँ धारा
भेल अछि अखन शसंकित जनता नेपाली सारा
परवा छे तों सहासी पृय सभक मोनक विश्वासी
कर तोँ कोनो उपाय रहे नहि किओ बनवासी

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20150609_BinitThakur_Poem

बेटीक भाग्य विधान

बीसम बसन्त जाहि घर बीतल सेहो घर भेल आब आन
किया विधना फेरि(फेरि कऽ लिखे बेटीक भाग्य विधान

के आब भोरक भुरुकबामे उठि कऽ चुनत बागक फूल
एतबो नै कोना सोचलन्हि बाबा कोना पठाबथि दोसर कूल
के बाबा संग पूजालग बैसतै के देतै अरिपन दलान

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20150421_BinitThakur_Poem

चहुँदिश अमङ्गल

स्वार्थेबस मानव उजारलक ओ जङ्गल ।
तैं धरती पर देखल चहुँदिश अमङ्गल ।।
ठण्ढी में कनकनी गर्मी में अधिक गर्मी ।
नदी नाला के आब बन्द भऽ गेल सर्बी ।।

बिन मौसम मे वर्षा कतहुं खसे ठनका ।
भेल पाथरे सँ घायल जीवजन्तु उपरका ।।
खेत भेल बालुबुर्ज कम किसानक उबजनी ।
खर्चा भेल रुपैया अछि आम्दानी अठन्नी ।।

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20150401_BinitThakur_poem

भरल नोर में

केहन सपना हम मीता देखलौँ भोर में ।
माय मिथिला जगाबथि भरल नोर में ।।
कहथि रने वने घुमी अपन अधिकार लेल ।
छैं तूँ सुतल छुब्ध छी तोहर बिचार लेल ।।

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20150327_BinitThakur_poem

कोरो आ पाढि

गरीब छोरि कऽ के बुझतै गरीबीके मारि ।
ओ तऽ पेटे लेल जरबै छै कोरो आ पाढि़ ।।
भेल छै स्वार्थी सब नेता अपने स्वार्थे में चूर ।
छिनलकै जे सपना सुख भऽ गेलैक कोसो दूर ।।

ओकरे पर सब मुंहगरहा करैछै ब्रह्म लूट ।
निकालै छै ओकरेसँ फाइदा करा कऽ फूट ।।
रहितै जे ओकरो लग अपन ज्ञानक बखारी ।
नै बनितै समाजक लेल दरिद्र ओ भिखारी ।।

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मैथिली साहित्यमे ‘भगजोगनी’क आगमन

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वास्तवमे असल साहित्य मस्तिष्कके मसी सँ नहि लिखल जाइत अछि, हृदयके मसी सँ लिखल जाइत अछि । हृदयमे मसि सञ्चित करैल पैघ, त्याग आ तपस्या चाही । लिखव कहिक नहि लिखाइबला आ नहि लिखब कहियौ क कतौ न कतौ सँ प्रष्फुटित होइबला चिज थिक- साहित्य । साहित्यसाधक जेजेहेन जीवन भोगने अछि, जे चिजमे अपना भिजल अछि आ जे सँ अपनके छुवाएल अछि, ओकरे हुबहु लिपीवद्ध करैत अछि । एना करैत काल कतौ अपने आपके चरम आनन्दमे पहुचेलाह बात आवसकेत अछि । कतौ नहि निक सँ बिझायल बातसभ व्यक्त होब सकैत अछि । साधक स्रष्टा मात्रे नहि भक जीवन आ जगत्के द्रष्टा सेहो होब जायत अछि ।

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कमजोरी समाजक आओर शैक्षिक जगतके !

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प्रिय चेली,

सन् २०१२ क मार्च ८ काल्हि मात्रे छल आ सेहो काहिल्ये खतम भेल । पैघपैघ नेतानेतृ आ नीति निर्मातासभ भव्य मञ्चपर भव्य बातचितसभ केलाह । ओ बातचितसभ आलिसान महलक मखमली विस्तरापर बैसक कयल गेल छल । ओ हुनकेसभक लेल छल । तोरा आ हमरसभक लेल नहि छल । ओ अहङ्कारीसभक ललिपप चटाबैबाला गप्प छल । छल, ओसभ एके बेर उठाक छतसँ जमिनपर खसाबैबला बात ।

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प्रगतिवादी साहित्यक यात्रामे एकटा नवका इतिहास: “मिथिला मुक्तिके संनेश”

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प्रगतिवादी कला, संस्कार, सस्कृति आओर जनसाहित्य समाज रुपान्तरके एकटा बहुत भारी नमहर बैचारिक हतियार अइछ । प्रगतिशिल समाजिक जीवन निर्माणमे प्रगतिवादी कला साहित्यके बहुत नमहर भुमकिा रहैत अइछ ।

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