विविध भाषाका रचना
मैंने नहीं उतारी सलवार ( एक भारतीय महिला माओवादीको कविता )
(एक भारतीय महिला माओवादीको कविता)
मैंने नहीं उतारी सलवार
रात भर थानेदार ने बैठा के रखा थाने में
फिर भी, मैंने नहीं उतारी सलवार ।
वो चीखा चिल्लाया, गला फाड़ा
पर मैंने भी कस के पकड़ रखा था नाड़ा
मैंने नहीं उतारी सलवार ।
चार दिन थाने में रही,
लटकी रही सिर पे तलवार,
पर मैंने नहीं उतारी सलवार ।
थाने से छूटी तो सीधे जंगल गयी,
वहाँ कामरेड थे, उनसे धरी गयी,
मैं अकेली, वो थे चार,
उन ने तार तार कर दी सलवार ।
थानेदार तो पराया था,
पर ये सब तो अपने थे
नक्सली आंदोलन को ले के,
क्या क्या देखे सपने थे,
सब सपने हुए तार तार,
जब अपने ही कामरेडों ने,
खींच के उतारी सलवार…!! ”
याकती-वाराही-अजिमा
याकती-वाराही- अजिमा
अजिमा म्हसीका
प्रकाशमान शिल्पकार
मातृशक्ती उपासना यायगु परम्परा झीगु नेपालमण्डलय प्राचीन कालंनिसें हे जुयावया च्वंगु खनेदु । थुकिया दसिख: थन स्थापना यानातगु थीथी मातृदेवीया मूर्तित: । अथे हे जुया थीथी थाय थासय सप्तमातृका, अष्टमातृका, नवमातृका व तलेजु भवानी आदि मातृशक्तिद्री::पिंया नापं गंछिद्य:पिं स्थापना याना शक्ति पिठत: थापना याना लोकजनपिं व देया रक्षा याकात:गु खनेदु ।
याकती-वाराही-अजिमा
याकती-वाराही- अजिमा
अजिमा म्हसीका

प्रकाशमान शिल्पकार
मातृशक्ती उपासना यायगु परम्परा झीगु नेपालमण्डलय प्राचीन कालंनिसें हे जुयावया च्वंगु खनेदु । थुकिया दसिख: थन स्थापना यानातगु थीथी मातृदेवीया मूर्तित: । अथे हे जुया थीथी थाय थासय सप्तमातृका, अष्टमातृका, नवमातृका व तलेजु भवानी आदि मातृशक्तिद्री::पिंया नापं गंछिद्य:पिं स्थापना याना शक्ति पिठत: थापना याना लोकजनपिं व देया रक्षा याकात:गु खनेदु ।
ए ङा…..
ए ङा छ्याम् चिबरी, ताला वा म्हेन्दो?
सिमा छ्यामनुन् सिबरी, ताला वा म्हेन्दो?
पाँडाम्हेन्दो छार्माराङ, छार्जि ङाला सेमरी,
थे पाँडाला बास् रिबरी, ताला वा म्हेन्दो?
रिकछेन् एदा आम्राङ्साम्, क्राबा खाबा सेमरी,
क्राबा सेम्दा खिबरी, ताला वा म्हेन्दो?
थारेङ् आताउ बिमुला, चु सेम्से एदा,
थारेङ् निसाम् छ्याम् निबरी, ताला वा म्हेन्दो?
एदा डान्सि सेमनाङरी, ताङ्बा खाबा ङादा,
जैलिन् सेम्से झिबरी, ताला वा म्हेन्दो?
बाबा गणिनाथजी जिवन परिचय
ई भूलोक मे धर्मके रक्षा आ आपस के वैमनश्यता दुर करे खातिर परमपुज्य बाबा गणिनाथजी अवतार लिहनी । भारत देशके बैशाली जिलाके महनार गावमे श्री मंशारामजी गंगा नदी के किनारे आपन धर्म पत्नीके साथ रहत रही । दुनु प्राणीके कवनो संतान नारहे । भगवान शिवजीके भक्त मंशारामजी सात्विक विचारके रहनी आ आपन कवनो सामाजीक काम भगवान शिवजीके उपासना आ ध्यानमे मगन होके करत रही । भगवान शिवजी उनकर उपासनासे प्रशन्न होके एकदिन रातके सपनामे आके कहनी कि हे मंशाराम तोहर उपासना पुरा भइल । दोसर दिन मंशारामजी जंगलमे गइनि त देखनी कि एगो नवजात बच्चा पिपरके गाछि के निचा रहे जे मधुर मुस्कान विखेरत रहे आ ओकर माथासे अद्वितीय अलौकिक दिव्य प्रकाश चारु ओर फैल रहल रहे जेकर प्रभावसे गाछि से मध टपकल शुरु भईल आ मध सिधे लइकाके मुहमे गिररहल रहे आ लइका हस हस के मधुपान कररहल रहे । श्री मंशारामजी उ लइका के घरे ले अइले । लइकाके दिव्य शक्तिसे गांवके लोग आश्चर्यचकित रहे काहेकि उ लइका बचपने से आपन चमत्कार दिखावल शुरु कर देले रहे ।
थारू भषासाहित्य और संस्कृतिके एक झलक
खोला कताके ठण्ढा हावामे बहौत दिनसे कुदल चियै
टुटल नै छै हमर बनेलहा घर सदियौँसे बैसल चियै ।
आपन मातृभषा, आपन परम्परागत रीतिरिवाज, बेग्ले किसिमके सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संरचना और लिखित या मौखिक इतिहास भेल जमा ५९ जाइत या समुदायके आदिवासी जनजाति उत्थान राष्ट्रिय प्रतिष्ठान ऐन २०५८ के परिच्छेद १ धारा २ के (क) बमोजिम आदिवासी जनजाति कैहके परिभाषित क्याल गेल छै ।

सानीवामी नाक्का मान्तुप छुये होगो हेप्लो,
१)
कलयुगके राम बेमार भऽ गेलै,
नुप्पाहिम पेगाङ्बा
केहेन उजाड जँका सुनसान देखैछी
१)
अजमाइहैं सब आपन आपन हथकण्ड ,अपकी चुनाव मे
जाइतक टुकरी नै ऊँच–नीच महान्