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मैथिली साहित्यमे ‘भगजोगनी’क आगमन
वास्तवमे असल साहित्य मस्तिष्कके मसी सँ नहि लिखल जाइत अछि, हृदयके मसी सँ लिखल जाइत अछि । हृदयमे मसि सञ्चित करैल पैघ, त्याग आ तपस्या चाही । लिखव कहिक नहि लिखाइबला आ नहि लिखब कहियौ क कतौ न कतौ सँ प्रष्फुटित होइबला चिज थिक- साहित्य । साहित्यसाधक जेजेहेन जीवन भोगने अछि, जे चिजमे अपना भिजल अछि आ जे सँ अपनके छुवाएल अछि, ओकरे हुबहु लिपीवद्ध करैत अछि । एना करैत काल कतौ अपने आपके चरम आनन्दमे पहुचेलाह बात आवसकेत अछि । कतौ नहि निक सँ बिझायल बातसभ व्यक्त होब सकैत अछि । साधक स्रष्टा मात्रे नहि भक जीवन आ जगत्के द्रष्टा सेहो होब जायत अछि ।
