Skip to content

विविध भाषाका रचना

20187970_853127678178636_1391682736_n

लुंगी आ धोती (मैथिली कविता)

जाड सँ बचबाक लेल लुंगी पहिर घुर तर बैसल छी,
हावा बहिते धूवाँके आज्ञापालक बनि जाइत छी,
तईं कहियो पूरब त कहियो पश्चिम दिसि माथ घुमा लइत छी,
पछिया बहिते लुंगीके ओढना सेहो बना लइत छी ।

सियौऊवा डाढिबाला फाँटल पैन्ट डाँढमें लटकौने छी,
कोठारी पहिरब आशमें झालरबाला सैन्डो पहिरने छी,
सिट–सिट हावा बहिते थर–थर कपैत छी,
कखनों लुंगीके ओढना सेहो बना लइत छी ।।

धुआ धोती लगबैवाला सब हिटर तपैत देखने छी,
कर्सीबाला घुरक बात सेहो ओ सब करैत सुनने छी,
मुदा धोतीके ओढना बनाओल नहि देखने छी,
पूर्वा बहिते लुंगीके ओढना बना लइत छी ।।।

लुंगीके गाँति बन्हने बौआबुच्चीके देखने छी,

DineshYadav

मैथिली संस्कृतिमे ऋतु

विषय प्रवेश:
‘ऋतु’ शब्द ‘ऋत’ सँ बनल अछि । ई ज्ञानक परम्पराक एकटा विशिष्ट पारिभाषित शब्द थिक– एकर आत्यंतिक अर्थ होइछ– ‘अस्तित्व अर्थात् चराचर सत्ताके संचालन करैवाला परम नियम ।’ एहन नियम जेकरा, कियों बनबैत नई छहि, मुदा अस्तित्वक सत्तामें ई अपने आप समाहित अछि । समय आ जीवनमें ‘संस्कृति’क रचना मनुख करैत छहि । प्रकृतिक चक्रमें ऋतु अबैत अछि– लोक ऋतुसँ जुडल पर्व–त्यौहारक रचना कएलक अइछ–पर्व–त्यौहारक देवता आ पूजा–अनुष्ठान, पर्वसभके संगैह नृत्य आ गीत, चित्र आ शिल्प, विश्वास आ लोकाचार स्थापित भेल अछि (तिवारी, सन् २००९) । तईं ‘लोकक ऋतुगीत प्रकृतिके सुन्दरता, पर्व–त्यौहारक ‘मंगल अवसर’ आ ‘संस्कृतिके रचना उत्सव’ संगैह अछि ।

VinayKumarJha

कवि कोकिल विद्यापतिके संक्षिप्त परिचय

मैथिलीमें लिखल किछु पदावली कविके अमरच्व प्रदान करवाक लेल काफी छैक । मैथिली साहित्यमें मध्यकालके तोरणद्वार पर जिनकर नाम स्वर्णाक्षरमें अंकित छैक वो छथिन चौदहवीं शताब्दीके संघर्षपूर्ण वातावरणमें उत्पन्न अपन युगके प्रतिनिधि मैथिली साहित्य-सागरके वाल्मीकि-कवि कोकिल, महाकवि अभिनव जयदेव विद्यापति ठाकुर ।

कवि कोकिल विद्यापतिके कोमलकान्त पदावली वैयक्तिकता, भावात्मकता, संश्रिप्तता, भावाभिव्यक्तिगत स्वाभाविकता, संगीतात्मकता तथा भाषाके सुकुमारता आ सरलताके अद्भुत सन्योजन प्रस्तुत करैत छैक ।

सुन्तलाला ब्रोइ (तामाङ कथा)

‘लु एदा सुन्तला !’ माइली लुङगेलिसे सुन्तला चाबारि हृसि हाइरान ताना लाबा कोलाला ग्राम्बारि याफ्लासे फ्राङ ङ्ह्याना छेप्सि क्रिङजि, ‘दातेम म्ह्याङजिकि सुन्तलाला स्वाद ?’

कोलाला ग्राम्बारि छेप्बा थेला या सारि बाङसे व्यवासे थे फेद छोर्जि । तिल्मा ङ्यासे जामे किर्निमाया थेन सहनदा डान्सि क्रानाक्राना थे थेरिन बेहोस तासि गुर्बा मुबा ।

कांको आमाइको दिन चर्या (धिमाल कविता)

का एलोङ डोकोता
कांको आमाइको जिवन कथा तिङ्खाँ
किया बाखोरको डाँकता ल्होसिखें
हस्यङ्फस्याङ पाकाताङ
र्हिमा, र्हिमाङभरि
खाजा चिको तयारिता जुटिका तिङ्खाँ
दिन न्हिसिन इस्काङ दैनिक दोहोरिखें
कांको आमाइको हरेकपल जिवन गाथा ।

शहीदक पत्नी – वीरांगना

सुनी दुष्ट शासक अन्यायी खबर
गगन काँपल धर्ती पर कहर
बौक भगेलैन खङ्कैत कंगना चुरी
करेजा घोपा गेलैन तलवार छुरी

कोमल बदन बनल छन्ही पाँथर
पवनो नही सिंहकल छन्ही आँचर
बारिए बरिसमे तेजल शृगार
बिसरल छथि ककरा कहै दुलार

इ नगरी छै विशेष (कविता)

एहि एशिया मे हमर नेपाल
बड सुन्दर, शान्त, विशाल छै
कमल फूल सन मधेश हमर
जेना गगणमे पूर्णिमाक चान छै ।

ई नगरी छै विशेष
करु भिजिट मधेश

मिम्लेन् हेन्छीङ् फुङ्हा ?

मिम्लेन् हेन्छीङ् फुङ्हा ? फेक्खुङ् ल ? आ
निङ्वाबा आक्खेन् पान्ःहा चेक्खुङ् ल ? आ
आक्खेन् कुधाक् मेलुम्सीङ् मेमेगेआङ् वा
खेन्हा ? रे चिरीहा ? केरेक् थिक् थिक् लेक्खुङ् ल ? आ

प्रसव पीडा (कविता)

दिने मे देखारहल छल रातुक तरेगन
पत्ता नही छल चान उतरल हम देखब

छटपट तन पर भारी पीडाके बादल
मोन तैयो छल जेना अरिपन देल आँगन

अपघटमे प्राण मुदा वसन्त पसरल छल
भुलल छलौ व्यथा नव जीवनके आभाश छल