लुंगी आ धोती (मैथिली कविता)
जाड सँ बचबाक लेल लुंगी पहिर घुर तर बैसल छी,
हावा बहिते धूवाँके आज्ञापालक बनि जाइत छी,
तईं कहियो पूरब त कहियो पश्चिम दिसि माथ घुमा लइत छी,
पछिया बहिते लुंगीके ओढना सेहो बना लइत छी ।
सियौऊवा डाढिबाला फाँटल पैन्ट डाँढमें लटकौने छी,
कोठारी पहिरब आशमें झालरबाला सैन्डो पहिरने छी,
सिट–सिट हावा बहिते थर–थर कपैत छी,
कखनों लुंगीके ओढना सेहो बना लइत छी ।।
धुआ धोती लगबैवाला सब हिटर तपैत देखने छी,
कर्सीबाला घुरक बात सेहो ओ सब करैत सुनने छी,
मुदा धोतीके ओढना बनाओल नहि देखने छी,
पूर्वा बहिते लुंगीके ओढना बना लइत छी ।।।
लुंगीके गाँति बन्हने बौआबुच्चीके देखने छी,

विषय प्रवेश:
५३.
मैथिलीमें लिखल किछु पदावली कविके अमरच्व प्रदान करवाक लेल काफी छैक । मैथिली साहित्यमें मध्यकालके तोरणद्वार पर जिनकर नाम स्वर्णाक्षरमें अंकित छैक वो छथिन चौदहवीं शताब्दीके संघर्षपूर्ण वातावरणमें उत्पन्न अपन युगके प्रतिनिधि मैथिली साहित्य-सागरके वाल्मीकि-कवि कोकिल, महाकवि अभिनव जयदेव विद्यापति ठाकुर ।
आयल छै फगुवा पावन होरी
का एलोङ डोकोता