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विविध भाषाका रचना

धूर अहा बरद छी (मैथिली व्यङ्ग्य कविता)

दोसरेके लेल बहब,
खुट्टामे बानहल रहब,
कुट्टीसानी लेल टुकुर–टुकुर ताकब,
मलिकवाक दाना लेल कच्छर कातब,
डिरिएबाक आदत बनाएब,
तिरपित ओहीमे रहब,
झुठ नई छै शनिश्चराक कहब–
धूर अहा बरद छी ।१।

मिथिला मधेशक पावनि छठि

गाम समाज, एकही ठाम पुजे
छठि पावनि, बड विशेष छै
डुबैत सुरुजसँग, उगैतके पुजब
अही पावनिके, दिव्य सन्देश छै

ब्राह्मण क्षेत्री वैश्य हरिजन
अर्घ देवलाय, सँगसँग ठार छै
नर नारी जवान वृद्ध सभकेउ
परमेश्वरीके, करैत प्रणाम छै

भरदुतिया (लघुकथा)

भरदुतियाक दिन छलै । भोरे सबेरे सब गोटे उठि आहारबहार निकललै । एने गोपाल सुतले छलै ।

माइः (आवाज लगेलकै) ‘बाउ, बाउ रे बाउ!गोपला छी रै? भोर नै भेलै ?’

गोपाल: आँहि.., (ऐँठी मारैत) , हँ उइठ गेलियै ।

मिथिलाके दानापानिए बताह छै

जकरा भेटल बन्दुक सेहा हबलदार छै,
दोसरके अल्पज्ञानी अपनेटाके सर्वज्ञानी मानै छै,
गुण-दोषके पहिचान नई छै,
आत्मप्रशंसा गत्तर-गत्तर भरल छै,
डेग डेग सर्वेसर्वाके अभिमानी छै,
ठोप-कमण्डल बड भारी छै,
मिथिलाके दानापानीए बताह छै ।

20201202_RambharosKapariBhramar-Lekh

हाइकु अन्तरिक्षक एकटा नव उपग्रह : वसुन्धरा

गढिकऽ रचना करब हमरा कहियो नीक नहि लागल । हम ओहन रचना के गढ़ब बुझैत छी जाहि मे लेख्य अनुशासनक बात कहल जाइत होइक । यथा गजल लेखन, कोनो विशेष अवसरक गीत लेखन आ कविता लेखन । आब त तेहने काव्य अनुशासनक परिधि मे रहि नव प्रयोग हाइकु लेखन आयल अछि ।

मैथिली भाषाक क्षेत्र मे सेहो हाइकु बेस लोकप्रिय भेल जा रहल अछि । जापान सँ आएल ई काव्य विधा हिन्दी, नेपाली होइत मैथिली भाषा मे सेहो प्रयोग होमय लागल अछि । एहि विधा के पुस्तकाकार प्रकाशन होइत अछि ।

दुर जो कोनाक बेमत भेल छी ?

दशमीबाट तकिते बितल कोजगराक चान उगादीय
फुल हमर फुलल अछि आबि अँहा आँगन गमकादीय

धोती कुर्ता गमछामे अँहा लगबै जेना नवका वर यो
ललितगर नुवा पहिर हमहु बटबै पान मखान यो

का लेङ्लि हाइदोङ अर्थ मान्थु (कविता)

का लेङ्लि हाइदोङ अर्थ मान्थु ना खार्तेङ हानेलाउ
काङ्को जिवनसो दुरे झन् दुरे हानिकाताङ हानेलाउ
नादोसाङ काङ्को जिवनको कदम उन्धितेङ हानेलाउ
का हेता दोकाआ रो,लेङ्लि जब ना मेओतेङ हानेलाउ

दिलको ब्यथा बल्झिखें घरीघरि ना छुटिनासो
सन्चो मान्थु जिवन्ता बोमि जेन्तेङ लेङ फुटिनासो
बदलेलि माद्वोघाँ नांको लेङ्मुचुका स्यहारि परिनासो
काङ्को जिन्दगि खान्तेङ नाङ्कोङ प्यारि परिनासो

ShyamPritMandal

ललका बेल्ट (मैथिली कथा)

~माए गै ! हमहूँ हटिया जेबै !
~से किया रे ? नइँ जो, साँझ पैड गेलै, दोसर दिन जाइहें । हे तोराल’ हम जलखै नने एबौ, फोँफी सोहो नन’ लएबौ ।
~नइँ जोऽऽ, हम जेबेऽ करबै । नाइँ, नाइँ, नाइँ….. । (काइनते काइनते)
~ मर, नै कान न’ रे । आब कि करबै ? कमलपुर बाली हमरा खातिर रूकल हेतै । ले,ले चल चुप हो, चल । पहिलैये लेट भ’ गेलै ।

KarunaJha

बुढापा (बृद्धावस्था)

व्याकुल भ हमर मन
पुछि रहल भगवान सँ
किया भटकि गेल मानव
आई अपन इमानसँ ।
बृद्ध भेनाई कोनो पाप नहि
तइयो ई विषक प्याला अछि
वृद्ध क खातिर कोनो सन्तान
आई समय नई निकालत अछि ।

अपने औथिन गाम (मैथिली कविता)

आब शरद्क ऋतु आगमनके एहसास होइय
बढी जाइय खुशी आनन्दके आभास होइय
वितरहल विरहक घरी अपने औथिन गाम
बाट जोहैत चञ्चल नयन करतै आब आराम

उथल पुथल अखने सँ मचि गेल अही मोनमे
सुरुजक किरण सेहो कहैय बहुत किछु भोरमे
नही बसमे किछुओ हमर धडकन छ‌ै बेहाल
शेष रहितो चारि दिन मचा रहल छै उदफाल

सिरजात्ता आमाइको सम्झना

आमाइ नेनिबारे लोलि मापिहि दोन्भारे लाङ्का
दोन्भारेतें जेसा बेलाताङ छुटि र्हेतेङ ताताङ्का ।

सिरजातको जात्रि हेन्साङ जेङ्होइ माखाङ्का
आमाइ का सिरजात्ता बागियाँ चिचिरि चाङ्का ।

असफल जिन्दगि

जिबन संघर्सको यात्रागेलाइ पाराकाताङ हानिघाँ
गुजारा खिनिं चलिकाताङ हानिहि,
जिन्दगिता काम्हाइलि सुख सायल बाँन्चिलि दोकाते,
कथा काहानि खिनिं जेङ्काताङ हानिहि ।

नापिहि भाग्यहोइसाथ नातें कर्महोइ, माबुझिका
जिन्दगि अझै तनाव हि दोपिकाताङ हानिहि,
सफलताको पाहिरो ताकेका या जिन्दगिहोइ
झन्झन् टेन्सनको पार्खाल थोपिकाताङ हानिहि ।

ने कहके आँट रखैत छी (मैथिली गजल)

भुलि नई सकैछी ने कहके आँट रखैत छी
मोन ही मोन सही बहुत याद करैत छी

व्याकुल होइछी जखन देखलाय सुरतके
अँहाके डि.पी. के जुम कय कअ देखैत छी

KiranJha

बन्द करू दहेज प्रथाके (गीत)

बन्द करू बन्द करू बन्द करू
दहेज प्रथाके अन्त करू
करय छी बरागत सत सत प्रणाम
हटाऊ सब मिलिक दहेजक नाम ।

महामांस बेची जुनी कटु फुफाकर
आदर्श ब्याह करू बनु उदार
पुत्र अहाके रत्न समान
हटाऊ सब मिलिक दहेजक नाम ।

AbhitKumarChaudhary

सप्तरीके थारू संस्कृति : एक विश्लेषण

खोला कताके ठण्ढा हावामे बहौत दिनसे कुदल चियै
टुटल नै छै हमर बनेलहा घर सदियौँसे बैसल चियै ।

आपन मातृभषा, आपन परम्परागत रीतिरिवाज, बेग्ले किसिमके सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संरचना और लिखित या मौखिक इतिहास भेल जमा ५९ जाइत या समुदायके आदिवासी जनजाति उत्थान राष्ट्रिय प्रतिष्ठान ऐन २०५८ के परिच्छेद १ धारा २ के (क) बमोजिम आदिवासी जनजाति कैहके परिभाषित क्याल गेल छै ।

देसान- कहर

वसन्तको मौसम ताइको गतिता झोतेङ्हि
प्राकृति याम निमभाइपा खेपितेङ्हि
सदियौसो
सान्हे उस्काङ हि
तालि उस्काङ हि
न्हिसिन उस्काङ दिना उस्काङ
समयें बुङ वाकोङ गतिता चलितेङ्हि
पृथ्बि रो प्राकृतिक मौसमगेलाइ बुङ

मधुर मिलनके आस यो (मैथिली गजल)

हरियर सारी हरियर चुरी हरियर छैक मास यो
मास छैक मधुमास इ मधुर मिलनके आस यो

दुर रहब नहि उचित अपन कनियाँ वियाही सँ
लौटु अपन मरैयामे कते हमरा करब उदास यो