मैथिलीमें लिखल किछु पदावली कविके अमरच्व प्रदान करवाक लेल काफी छैक । मैथिली साहित्यमें मध्यकालके तोरणद्वार पर जिनकर नाम स्वर्णाक्षरमें अंकित छैक वो छथिन चौदहवीं शताब्दीके संघर्षपूर्ण वातावरणमें उत्पन्न अपन युगके प्रतिनिधि मैथिली साहित्य-सागरके वाल्मीकि-कवि कोकिल, महाकवि अभिनव जयदेव विद्यापति ठाकुर ।
कवि कोकिल विद्यापतिके कोमलकान्त पदावली वैयक्तिकता, भावात्मकता, संश्रिप्तता, भावाभिव्यक्तिगत स्वाभाविकता, संगीतात्मकता तथा भाषाके सुकुमारता आ सरलताके अद्भुत सन्योजन प्रस्तुत करैत छैक । वर्ण्य विषयके दृष्टिसे हिनकर पदावली एक तरफसँ हिनका रससिद्ध, शिष्ट एवं मर्यादित श्रृंगारी कविके रुपमें प्रेमोपासक, सौन्दर्य पारसी तथा पाठकके हृदयके आनन्द विभोर करै वाला माधुर्यके स्रष्टा, सिद्धहस्त कलाकार सिद्ध करैत छैक त दोसर तरफ हिनका भक्त कविके रुपमें शास्रीय मार्ग एवं लोकमार्ग दुनुमें सामंजस्य उपस्थित करै वाला धर्म एवं इष्टदेवके प्रति कविके समन्वयात्मक दृष्टिकोणक परिचय देववाला एक विशिष्ट भक्त हृदयके चित्र उपस्थित करैत छैक । अहिके साथ-साथ लोकाचारसे सम्बद्ध व्यावहारिक पद प्रणेताके रुपमें हिनका मिथिलाके सांस्कृतिक जीवनक कुशल अध्येता प्रमाणित करैत छैक ।
एतवेक नही, यी पदावली हिनकर जीवन्त व्यक्तित्वके भोगल अनुभूतिके साक्षी बनी समाजके तात्कालीन कुरीति, आर्थिक वैषम्य, लौकिक अन्धविश्वास, भूत-प्रेत, जादू-टोना, आदिके उद्घाटक सेहो छैक । अहिसबके साथ साथ यी पदावलीके भाषा-सौष्ठव, सुललित पदविन्यास, हृदयग्राही रसात्मकता, प्रभावशाली अलंकार, योजना, सुकुमार भाव व्यंजना एवं सुमधुर संगीत आदि विशेषता पदावलीके एक उत्तमोत्तम काव्यकृतिके रुपमें सेहो प्रतिष्ठित करैत छैक । ओना यी एक महत्वपूर्ण तथ्य ऐछ जे महाकवि विद्यापति अपन अमर पदावलीके रचनाके लेल अपन पूर्ववर्ती संस्कृत कविसब विशेषत: भारवि, कालिदास, जयदेव, हर्ष अमरुक, गोवर्द्धनाचार्य आदि के कम ॠणि नहीं छथिन कारण जाही विषयसबपर महाकवि अपन पदावलीमें वर्णन कयने छथिन वो विषय पूर्वसे संस्कृतके कविसबहक रचना सबमे में वर्णन भS चुकल छैक । विद्यापतिजीके मौलिकता अहिमें निहित छैक जे हुनकर रचनासबमे विषय उपमा अलंकार परिवेश आदिके अन्धानुकरण नही भSके ओहिमे अपने दीर्ध जीवनके महत्वपूर्ण एवं मार्मिक नानाविध अनुभव एवं आस्थाके अनुस्यूत कS अप्रतिम माधुर्य एवं असीम प्राणवत्तासे युक्त मातृभाषामें एना प्रस्तुत कयल गेल छैक जे ओ हिनक हृदयसे सहज रुपसौं प्रष्फुटित भSके सम्पूर्ण मानवके हृदयमें प्रवेश कS जाइत छैक । अही कारण महाकविजीके काव्य प्रतिमाके गुञ्ज केवल मिथिलांचल तक नहीं अपितु समस्त भारतवर्षके साथ साथ अखिल विश्वमें व्याप्त छैक । राजमहलसे लSके पर्णकुटीतकमें गुंजायमान विद्यापतिके कोमलकान्त पदावली वस्तुत: दक्षिण एशियाके साहित्यके अनुपम वैभव अछी ।
मैथिल कवि कोकिल, रसासिद्ध कवि विद्यापति, तुलसी, सूर, कबीर, मीरा सबसौं पहले के कवि छथिन । ओना अमीर खुसरो हिनकासौं पुर्वके कवि छलाह । संस्कृत, प्राकृत अपभ्रंश एवं मातृ भाषा मैथिली पर हिनकर समान अधिकार छलैन्ह । विद्यापतिके रचनासब संस्कृत, अवहट्ट, एवं मैथिली तिनु भाषामे भेटैत छैक ।

बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न यी महाकविके व्यक्तित्वमें एकसाथ चिन्तक, शास्त्रकार तथा साहित्य रसिकके अद्भुत समन्वय छलैन्ह । संस्कृतमें रचित हिनकर पुरुष परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली, शैवसर्वश्वसार, शैवसर्वश्वसार प्रमाणभूत पुराण-संग्रह, गंगावाक्यावली, विभागसार, दानवाक्यावली, दुर्गाभक्तितरंगिणी, गयापतालक एवं वर्षकृत्य आदि ग्रन्थ जत एक तरफ हिनकर गहन पाण्डित्यके साथ साथ कविकोकिलके युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा स्वरुपके साक्षी छैक ओहिठाम दोसर तरफ कीर्तिलता एवं कीर्तिपताकाके महाकविके अवहट्ट भाषा पर सम्यक ज्ञानके सूचक होयवाक साथ-साथ ऐतिहासिक साहित्यिक एवं भाषा सम्बन्धी महत्व राखैवाला आधुनिक भारतवर्षके आर्य भाषाके अनुपम ग्रन्थ छियैक। विद्यापतिके कालजेयी कीर्तिके आधार छियैक् मैथिली पदावली जाहिमें राधा एवं कृष्णके प्रेम प्रसंग सर्वप्रथम उत्तरभारतमें गेय पदके रुपमें प्रकाशित भेल छलैक । हिनकर पदावली मिथिलाके कविसबके आदर्शे नही वरण नेपालके शासक, सामंत, कवि एवं नाटककार सब सेहो हिनका आदर्श बना मैथिलीमें रचना करS लागलाह बादमें बंगाल, असम आ उड़ीसाके वैष्णव भक्तसबमें सेहो नवीन प्रेरणा एवं नव भावधारा अपन मनमें संचालित कS विद्यापतिके अंदाजमें पदावलीसबके रचना होइत रहलैक आ विद्यापतिके पदावलीसबके मौखिक परम्परासे एक से दोसर व्यक्तिसबमें प्रवाहित होइत रहलैक् ।
साहित्यक धारा कोना चलैत रहलैक तकर प्रमाण हमरासबके नेपाल एवं आसाममे उपलब्ध नाटक सभसँ होइत अछि । मिथिलाक कर्णाट राजासँ अपन वंशक उत्पत्ति मानयवला भादगाँव आ काठमांडुक मल्ल राजा मैथिली साहित्यकें संरक्षण प्रदान कयलनि । विद्यापतिक पश्चात् नेपालमे अनेक नाटकक रचना भेल जकर लेखक लोकनिमे किछु मैथिल कवि तथा नेपालक राजा लोकनि छलाह । ओहि नाटक सभक भाषा पूर्णतः मैथिली छलैक, ओना कतहु-कतहु ओहिमे नेपालमे प्रचलित नेवारी भाषाक प्रयोग भेटैत अछि । अठारहम शताब्दीक मध्य धरि, जखनधरि मल्ल राजासब शासक छलाह, मैथिली नेपाल दरबारक साहित्यिक भाषा बनल रहल आ विद्यापति प्रेरणाक एकटा स्रोत ।
रविन्द्रनाथ टैगोरके कहब छनि “विद्यापति आनन्दक कवि रहथि आ प्रेमे हुनका लेल जगतक सारतत्व रहलनि ।”ओ ‘भानुसिंहेर’पदावली लिखलनि जकरा ओ स्वयं मैथिलीक अनुकृति कहैत छथि । विद्यापतिके प्रसंगमें स्वर्गीय डॉ. शैलेन्द्र मोहन झाके उक्ति वस्तुत: शतप्रतिशत यथार्थ छैक वो लिखैत छथिन: “विद्यापतिक स्वर सर्वत्र समान रुपसँ गुंजित होइत रहैत छनि। हिनक ई अमर पदावली जहिना ललनाक लज्जावृत कंठ सँ, तहिना संगीतज्ञक साधित स्वरसँ, राजनर्तकीकS हाव-भाव विलासमय दृष्टि निक्षेपसँ, भक्त मंडलीक कीर्तन नर्तनसँ, वैष्णव-वैश्णवीक एकताराक झंकारसँ नि:सृत होइत युग-युगसँ श्रोतागणकें रस तृप्त करैत रहल अछि एवं करत। मिथिला मैथिलक जातीय एवं सांस्कृतिक गरिमाक मान-बिन्दु एवं साहित्यिक जागरणक प्रतीक चिन्हक रुपमें आराध्य एवं आराधित महाकवि विद्यापतिक रचना जहिना मध्यकालीन मैथिली साहित्यिक अनुपम निधि अछि तहिना मध्यकालमें रचित समस्त मैथिली साहित्य सेहो हिनके प्रभावक एकान्त प्रतिफल अछि।”
महाकवि विद्यापतिके जन्म वर्तमान मधुबनी जनपदके विसफी नामक गाँवमें एक सभ्रान्त मैथिल ब्राह्मण गणपति ठाकुर (हिनक पिताके नाम) के घरमे भेल छल । बाद में यसस्वी राजा शिवसिंह यी गाँव विद्यापतिके दानस्वरुप देने छलखिन । वो दानपत्रके प्रतिलिपि एखनो विद्यापतिके वंशजके पास सुरक्षित छैक जे आजुकल सौराठ नामक गाँव में रहैत छैक । उपलब्ध दस्तावेजसब एवं पंजी-प्रबन्ध के सूचनासौं यी स्पष्ट होइत छैक जे महाकवि अभिनव जयदेव (राजा शिवसिंहसं विभुषित उपाधि) विद्यापतिके जन्म एहेन यशस्वी मैथिल ब्राह्मण परिवारमें भेल छल जत विद्याके देवी सरस्वतीके साथ साथ लक्ष्मीजीके सेहो असीम कृपा छलैन्ह । अही विख्यात वंशमें (विषयवार विसफी) एक-से-एक विद्धान्, शाश्त्रज्ञ, धर्मशास्री एवं राजनीतिज्ञ भेल छल । महाकविके व्रिद्धप्रपितामह देवादिव्य कर्णाटवंशीय राजासबके सन्धि, विग्रहिक छलखिन तथा देवादिव्यके सात पुत्रसबमें से धीरेश्वर, गणेश्वर, वीरेश्वर आदि महाराज हरिसिंहदेवके मन्त्रिपरिषद्के सदस्य छलखिन । पितामह जयदत्त ठाकुर एवं पिता गणपति ठाकुर राजपण्डित छलाह । अर्थात पाण्डित्य एवं शास्त्रज्ञान कवि विद्यापतिके सहज उत्तराधिकारमें भेटलैन्ह । अनेक शाश्त्रीय बिषयसबपर कालजयी रचना सबके निर्माण कSके विद्यापतिजी अपन पूर्वजसबके परम्पराके आगां बढौलैन्ह ।
ओना कोनो लिखित प्रमाणके अभाव छैक जाहिसौं यी पता लगाओल जा सके कि महाकवि कोकिल विद्यापति ठाकुरके जन्म कहिया भेल छलैन्ह । तथापि महाकविके एक पदसौं स्पष्ट होइत छैक जे लक्ष्मण-संवत् २९३, शाके १३२४ अर्थात् सन् १४०२ ई. में देवसिंहके मृत्यु भेलैन्ह आ राजा शिवसिंह मिथिला नरेश बनलाह । मिथिलामें प्रचलित किंवदन्तीके अनुसार ओही समय राजा शिवसिंहके उमेर ५० वर्ष छलैन्ह और कवि विद्यापति हुनकासौं दुई वर्ष पैघ अर्थात ५२ वर्षके छलखिन । अही हिसावसौं (१४०२-५२) १३५० ई. में विद्यापतिके जन्मतिथि मानल जा सकैत छैक ।
ओना जनश्रुति त इहो छैक जे विद्यापति राजा शिवसिंहसे बहुत छोट छलाह । एक किंवदन्तीके अनुसार बालक विद्यापति बचपनसे तीव्र और कवि स्वभावके छलखिन् । एक दिन जखन ओ आठ वर्ष के छलाह तहिया अपन पिता गणपति ठाकुरके साथ शिवसिंहके राजदरबारमें पहुँचलैथ । राजा शिवसिंहके कहलापर विद्यापति निम्नलिखित दु पंक्तिके तत्क्षण निर्माण केलखिन:
पोखरि रजोखरि अरु सब पोखरा ।
राजा शिवसिंह अरु सब छोकरा ।।
राजा शिवसिंह विद्यापतिके बालसखा आ मित्र छलखिन, अत: हुनकर शासन-कालके लगभग चार वर्ष धरिके समय महाकविके जीवनके सबसे सुखद समय मानल जाइत छैक रचनाके दृष्टि सौं । राजा शिवसिंह विद्यापतिके यथेष्ठ सम्मान दैत छलैन्ह । कृतज्ञ महाकवि सेहो अपन गीतसबसौं अपन अभिन्न मित्र एवं आश्रयदाता राजा शिवसिंह एवं हुनक कुलपत्नी रानी लखिमा देवी (ललिमादेई) के अमर कS देलखिन । सबसे अधिक लगभग २५० गीतसबमें शिवसिंहके प्रशंसा मण्डित वर्णन भेटैत छैक ।
राजा शिवसिंहके शासन-कालके लगभग चार वर्षके वादके समय पुन: मिथिला पर दुर्दैवके भयानक प्रकोप भेल । यवनसबके आसन्न आक्रमणके आभाष पावी राजा शिवसिंह विद्यापतिके संरक्षणमें अपने परिजन सबके नेपाल-तराई-स्थित द्रोणवारके अधिपति पुरादित्यके आश्रममें रजाबनौली पठा देलखिन । युद्ध क्षेत्रमें सम्भवत: शिवसिंह मारल गेलखिन अथवा घायल भेलखिन । विद्यापति लगभग १२ वर्ष तक पुरादित्यके आश्रममें शिवसिंहके परिवारके आश्रय दैत रहलाह । अहिठाम विद्यापति लिखनावलीके रचना केलखिन जे कि ओही समयके एक पद से ज्ञात होइत छैक । हुनकालेल ओ समय बहुत दु:खदायी छलैन्ह । शिवसिंहके छोट भाइ पद्मसिंहके राज्याधिकार मिललाक वाद औइनवार-वंशीय राजासबके आश्रय महाकविके पुन: प्राप्त भेलैन्ह आ ओ मिथिला वापस लौटलाह । पद्मसिंहके केवल एक वर्षके शासनके वाद हुनकर धर्मपत्नी विश्वासदेवी मिथिलाके राजसिंहासन पर विराजमान भेली, जिनकर आदेशपर महाकवि दुइटा महत्वपूर्ण ग्रन्थः शैवसर्वस्वसार तथा गंगावाक्यावली लिखलैथ । विश्वासदेवीके वाद राजा नरसिंहदेव ‘दपंनारायण’, महारानी धीरमती, महाराज धीरसिंह ‘हृदयनारायण’, महाराज भैरवसिंह ‘हरिनारायण’ तथा चन्द्रसिंह ‘रुपनारायण’ के शासनकाल में महाकविके लगातार राज्याश्रय प्राप्त होइत रहलैन्ह ।
महाकवि वयोव्रिद्ध भेलाक वाद गंगामे देह त्यागके अभिलाषा अपन पुत्रसबसौं केलखिन तखन हुनकर जीर्ण शरीरके पालकीमें राखी सिमरिया घाट गंगालाभ करेवाक लेल निकललैक – आगां-आगां कहरिया पालकी लके आ पाछु-पाछु हुनक सगे-सम्बन्धी । रात-भर चलैत-चलैत जखन सूर्योदय भेलैक त विद्यापति पुछलखिन: “भाइ , हमरा यी बता दिअ जे गंगा और कतेक दूर छैक ?” कहरिया बजलाह “पौने दु कोस” । महाकवि प्रत्य्त्तरमे बजलाह “रुइक जाउ हमरासबके और आगु जेवाक जरुरत नहीं । गंगा स्वयं अहिठाम एतिह । जौं एक बेटा जीवनके अन्तिम क्षणमें अपन माँके दर्शनके लेल जीर्ण शरीरके लSके एतेक दूरसे आवैत छैक त कि गंगा माँ पौने दु कोस अपन बेटासौं भेटवाक लेल नही आवि सकैत छथिन माँ अवश्य एथिन ।”
एतैक कहलाक वाद महाकवि ध्यानमुद्रामें बैस गेलाह । पन्द्रह-बीस मिनट के अन्दर गंगा अपन उफनैत धाराके प्रवाहके साथ ओहिठाम पहुँच गेलखिन । उपस्थित सब आश्चर्यमे पडिगेलाह । महाकवि सर्वप्रथम गंगाके दुनु हाथ जोडी प्रणाम केलैथ आ जल प्रवेश कS निम्नलिखित गीतके रचना केलखिन:
बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे।
छोड़इत निकट नयन बह नीरे।।
करनोरि बिलमओ बिमल तरंगे।
पुनि दरसन होए पुनमति गंगे।।
एक अपराध घमब मोर जानी।
परमल माए पाए तुम पानी।।
कि करब जप-तप जोग-धेआने।
जनम कृतारथ एकहि सनाने।।
भनई विद्यापति समदजों तोही।
अन्तकाल जनु बिसरह मोही।।
महाकवि विद्यापति मृत्यु के सम्बन्ध में यी पद जनसाधारण में सर्वत्र प्रचलित छैक:
‘विद्यापतिक आयु अवसान
कातिक धवल त्रयोदसि जान।’
नगेन्द्रनाथ गुप्त सन् १४४० ई. के महाकवि के मृत्यु तिथि वर्ष मानैत छथिन । उमेश मिश्रके अनुसार सन् १४६६ ई. के बादतक सेहो विद्यापति जीवित छलाह । डॉ. सुभद्र झा कहैत छथिन “विश्वस्त अभिलेखसबके आधार पर हम यी कहवाक स्थितिमे छि जे कविकोकिल विद्यापतिके समय १३५२ ई. और १४४८ ई. के मध्यके छैन्ह । सन् १४४८ ई. के वादके व्यक्तिसबके साथ जे विद्यापतिके समसामयिकताके जोड़ दैत छैथ ओ सर्वथा भ्रामक अछि ।” डॉ. विमानबिहारी मजुमदार सन् १४६० ई. के वाद महाकविके विरोधाकाल मानैत छथिन । डॉ. शिवप्रसाद सिंह विद्यापतिके मृत्युकाल १४४७ मानैत छथिन ।
महाकवि विद्यापति ठाकुरके पारिवारिक जीवनके कोनो स्वलिखित प्रमाण नहीं अछी, मुदा मिथिलाके उतेढ़पोथी से ज्ञात होइत अछि जे हिनका दुइटा विवाह भेल छलैन्ह । प्रथम पत्नीसे नरपति आ हरपति नामक दु पुत्र छलैन्ह और दोसर पत्नीसौं एक पुत्र वाचस्पति ठाकुर तथा एक पुत्रीके जन्म भेल छलैन्ह । संभवत: महाकविके अही पुत्री के नाम ‘दुल्लहि’ छलैक जिनका मृत्युकालमें रचित एक गीतमें महाकवि अमर कS देलखिन:
दुल्लहि तोर कतय छथि माय।
कहुँन ओ आबथु एखन नहाय।।
वृथा बुझथु संसार-विलास।
पल-पल नाना भौतिक त्रास।।
माए-बाप जजों सद्गति पाब।
सन्नति काँ अनुपम सुख आब।।
विद्यापतिक आयु अवसान।
कार्तिक धबल त्रयोदसि जान।।
कालान्तरमें विद्यापतिके वंशज कोनो कारणवश (मुसलमानसबके उपद्रवसे तंग आवि) विसफीके त्यागक सदाके लेल सौराठ गाँव (मधुबनी जिलामें स्थित सभागाछी) बसाइ-सराइ केलाह । वर्तमानमे महाकविके सब वंशज अही गाँवमें निवास करैत छैथ ।
प्रा. डा. विनय कुमार झा
रसायन शास्त्र केन्द्रीय विभाग, त्रि. वि. कीर्तिपुर ।

पढेर महाकविबारे बुझ्ने अझ
पढेर महाकविबारे बुझ्ने अझ नयाँ अवसर भयो । यसका लागि आहाँकै बधाइ कहेछि । धन्यवाद ।