धूर अहा बरद छी (मैथिली व्यङ्ग्य कविता)


दोसरेके लेल बहब,
खुट्टामे बानहल रहब,
कुट्टीसानी लेल टुकुर–टुकुर ताकब,
मलिकवाक दाना लेल कच्छर कातब,
डिरिएबाक आदत बनाएब,
तिरपित ओहीमे रहब,
झुठ नई छै शनिश्चराक कहब–
धूर अहा बरद छी ।१।

बधिया त पहिने भ गेल,
बच्छाक जामाना गेल,
साढ बनाबक समय सेहो गेल,
मर्खाहा बनबाक नई करु झेल,
टाइरमे बहब जमाना गुजैर गेल,
खैर–दाना बिना लार–पुआर खाएब,
झूठ नई छै शुक्राके कहब–
धूर अहा बरद छी ।२।

घेंचमे लागल गरदामी,
ओईमे लटकल डोरी,
कहियौ औतैह लागल कौडी,
सिंहमे तेल मालिस तोडी,
अई सिंगारक नई कुनू जोडी,
जोतबालेल तयार रहब,
झुठ नई छै बृहस्पतियाक कहब–
धूर अहा बरद छी ।३।

आँखि बन्द कोलमे घुमै,
कहियो झपकैत–झपकैत हर तानै,
सदखनि जुआ आ पालो बहै,
जोतहा जब पुच्छ पकडै,
अरे आह–आह कहैत अइठै
कान फडफराबैत मुडि हिलाएब,
झुठ नई छै बुधनाक कहब–
धूर अहा बरद छी ।४।

कांढिसं इलाजक आदि,
अपना पर मूँहमे जाबी,
दूसराक बालि पर हाबी,
ढोकनासं निकलत बदमासी,
बेसी कसबाकलेल नाथि,
तइयौ जुवाली सहबे करब,
झुठ नई छै मंगालाक कहब–
धूर अहा बरद छी ।५।

लांधी खाली रहत,
पेटके लेल डिरियाबै पडत,
मलिकबा त जोतेबे करत,
दयाभावसँ मलिकाइन पुवार ओगरत,
गोबरकर्सी अपन मर्जीसँ उठाएत,
ठूठ पुच्छ हिला–हिलाके कुकुरमाछी भगाएब
झूठ नई छै सोमनाके कहब–
धूर अहा बरद छी ।६।

कतबो दौनि घुमब,
तइयो पेनी खाएब,
कहियो गोला कहाएब,
सिलेबिया सेहो कहाएब,
जौ नई बहब, त बुढवा कहाएब,
नियति बनल मालिकके खुश करब,
झुठ नई छै रवियाके कहब–
धूर अहा बरद छी ।७।
(कलंकी निवास, २०७७ पुस ३ )

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