इहि नेवाः थिती
ससनातन हिन्दू समाजय भात सितकि मिस्तय्गू बाकीँ जीवन थःगू परम्परागत सामािजक मान्याता कर्थ बिस्कं जीवन हनेमागु थिति दु । बिधवा जीवन हिन्दू मिस्तय्या लागिं छगु हाथ्या खः । तर हिन्दू हे जूसा झी नेवाः समाजय् मिस्त गब्लेहें “बिधवा “ जुइमखु , मिजं सिई घुंकानं सेोभाग्यवती हे जूया च्वनीगु नेवाः रितिथिति व मान्यता कायम जुयावया च्वंगु थन खने दू । झीगु नेवाः समाजय् बालबिवाह प्रथा दुमकाकेत छगु प्रगतिशिल व क्रान्तिकारि रितिथिति बिधिव्यवहार कायम याना वयाच्वंगु थ्व नेवाः संस्कार “इहि“ खः ।

मिम्जिमा ए !
सर्वत्र नेपालमे नववर्ष मङ्गलमय पर्वके रूपमे मनावेके प्रचलन रहल बा । नववर्षके दिन सबेरे नहाधोवाके आपन इष्टदेव, देवीके पूजा आराधना करके दोस्तलोगसे शुभकामना आदानप्रदान तथा मान्यजनलोगसे आशीष लेके मीठ खाना खाके आराम करके मनावलजाला । कोही कोही साथीभाइलोग मिलके वनभोज करके भा कवनो दर्शनीय ठावके भ्रमण करके भि नववर्ष मनावल करेला । नववर्षके दिन सरकारी छुट्टी होला ओहिसे नववर्ष निमने तरिकासे मनावल जाला । नववर्षके उपलक्ष्यमे तराईके जिल्लनमे कहि कहि मेला आ महावीरी झण्डा भि लागेला । कुस्ती, दङ्गल आ भेडाके लडाइ कराके भि नववर्षके दिन मनोरञ्जन कइलगइल मिलेला ।
वास्तवमे असल साहित्य मस्तिष्कके मसी सँ नहि लिखल जाइत अछि, हृदयके मसी सँ लिखल जाइत अछि । हृदयमे मसि सञ्चित करैल पैघ, त्याग आ तपस्या चाही । लिखव कहिक नहि लिखाइबला आ नहि लिखब कहियौ क कतौ न कतौ सँ प्रष्फुटित होइबला चिज थिक- साहित्य । साहित्यसाधक जेजेहेन जीवन भोगने अछि, जे चिजमे अपना भिजल अछि आ जे सँ अपनके छुवाएल अछि, ओकरे हुबहु लिपीवद्ध करैत अछि । एना करैत काल कतौ अपने आपके चरम आनन्दमे पहुचेलाह बात आवसकेत अछि । कतौ नहि निक सँ बिझायल बातसभ व्यक्त होब सकैत अछि । साधक स्रष्टा मात्रे नहि भक जीवन आ जगत्के द्रष्टा सेहो होब जायत अछि ।
१. भोरे उठके धरती माताके प्रणाम करी, मातापिताके प्रणाम करी । मातापिताके कष्ट दिहलजाई त दुःखी रहम । सुख दिहम त हमेशा अगाडि बढम ।
“तनी रास्ता छोडेम” आवाज कानमे पडते ही विभा अपन तंद्रासे जाग उठली । एगो महिला आपन गर्भवती बेटीके संगे उन्का कोच के तरफ आवत रहली । विभा एक अंगडाई लेलीन आ आपन नयां सहयात्रीलोग के तरफ देखे लगलीन ।