माघ शुक्ल पञ्चमीके दिनके बसन्त पञ्चमी कहलजाला । इ दिनके वाणीपूजा, वागीश्वरी पूजा तथा सरस्वती पूजनोत्सवके रूपमे मनावलजाला । इहे दिन रतिकाम महोत्सव, आम्रमञ्जरी भक्षण महोत्सव तथा लेखनी पूजन महोत्सव भि विभिन्न जगहमे मनावल गइल मिलेला । हमनीके देशके पहाड तथा तराई दुनु ठावमे खासकके वाग्देवी सरस्वतीके पूजनोत्सव धूमधामसे मनावल जाला । खासकके विद्यालय तथा क्याम्पसनमे सरस्वती पूजनोत्सवके तयारी प्रायः माघ महिनाके शुरूवेसे कइलजाला । स्कूलके विद्यार्थी खातिर इ पूजन उत्सवके रूपमे मनावल गइल मिलेला । माघ शुक्ल पञ्चमीके दिन विद्यार्थीलोग सबेरे उठके नहाधोवाके अगरबत्ती, पुष्पगुच्छा तथा अन्य पूजन सामग्रीलेके आ–आपन विद्यालयमे पहुचेलन आ सरस्वती पूजा भक्ति तथा उत्साहके रूपमे करेलन । सरस्वती पूजाके प्रसाद ग्रहण करेलन आ रातितक विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम करके खुशीयाली मनावेलन । राति सरस्वतीके पूजन आरती करके रात बितावेलन आ दोसर दिन सरस्वती विसर्जन करके मूर्ति जलाशयमे भसावेलन । एहतरे सरस्वती पूजनोत्सवके समापन होला ।

सरस्वती कवन देवता हइन तथा सरस्वतीके प्रादूर्भाव कहिया भइल आ प्रथम पूजा केकइलस जइसन प्रश्ननके जवाब श्रीमद्देवीभागवतके नवम् स्कन्धके चतुर्थ अध्यायमे विस्तृतरूपमे वर्णन कइलगइल मिलेला । जेकरा अनुसार– आविर्भूता यथा देवी वक्त्रतः कृष्ृणयोेषितः ।। अर्थात् कृष्णवल्लभा राधाके मुखसे सरस्वती प्रकट भइलिन् । आदौ सरस्वतीपूजा श्रीकृष्णेन विनिर्मिता । यत्प्र्रसादान्मुुनिश्रेष्ठः मूर्खो भवति पण्डितः ।। अर्थात् सर्वप्रथम श्री कृष्णजी सरस्वतीके पूजा प्रारम्भ कइनी, जेकर कृपा मात्रसे मूर्ख भि विद्वान हो सकता । माघस्य शुुक्लपञ्चम्यां विद्यारम्भदिनेअपि च । पूर्र्वेअन्हि समयं कृत्वा तत्रान्हि संयतः शुचिः ।। अथार्त् माघ शुक्लपक्षके पञ्चमी भा विद्यारम्भके दिन पूर्वाह्नकालमे प्रतिज्ञा कके उ दिन संयम तथा पवित्रताके साथ सरस्वती पूजन करेकेचाहि । स्नान आ नित्य क्रियाके बाद भक्तिपूर्वक कलश स्थापना करके प्रथम गणेशके पूजन करके सरस्वतीके षोडशोपचार विधिपूर्वक पूजन करेकेपडेला । आवाहन, प्राण प्रतिष्ठा, आसन, अघ्र्य, पाद्य, आचमनि, स्नानके बाद सुगन्धित श्वेत पुष्प, सुगन्धित श्वेत चन्दन, नया श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्पके माला, श्वेत रड्डके हार तथा आभूषण सरस्वतीके अर्पण करेके पडेला । नैवेद्य खातिर मक्खन, दही, दूध, धानके लावा, तिलके लड्डू, सफेद ईख, ईखके रस, रसके पकाके बनावल चाकू (गुड), मध, सफेद धानके नाटुटल चाउर (अक्षत), नाउसिनल सफेद धानके चिउरा, सफेद लड्डू, घ्यू आ सेंधा नून मिलाके बनावल शास्त्रोक्त हविष्यान्न, जौ तथा गहके आटाके घ्युमे भुजके तयार करल मिष्टान्न, केराके पिष्टक,नरिवल, नरिवलके जल,मूरई,आदि, पाकल केरा, बेल, बयर तथा देशकाल अनुसार उपलब्ध सुन्दर, सफेद तथा पवित्र ऋतुफल आदि भोज्य सामग्रीसब सरस्वतीके अर्पण करेके पडेला ।

एह तरे सरस्वती पूजन कइलाके बाद सरस्वतीके निम्नानुसार ध्यान करेके पडेला– हम भक्तिपूर्वक शुक्लवर्णके, मुस्कानयुक्त, परिपुष्ट तथा
श्रीसम्पन्न विग्रहके, अग्नि सदृश्य विशुद्ध वस्त्रधारण करल हातमे वीणा तथा पुस्तक धारण कइलनि, नया आभूषणसे विभूषित तथा ब्रह्मा, विष्णु, शिवद्वारा सम्यकरूपमे पूजित भगवती सरस्वतीके ध्यान करतानी । ओकराबाद वैदिक अष्टाक्षर मूलमन्त्र जाप करेके पडेला । मन्त्र अइसन बा – श्रीं ¥हीं सरस्वत्यै स्वाहा । इ मन्त्र कल्पवृक्षके समान फलदायी होला कहके उहे पुराणमे उल्लेख कइल गइल बा । चतुर्लक्षजपेनैव मन्त्रः सिद्धो भवेनृणाम् । यदिस्यान्मन्त्रसिद्धो हि वृहृहस्पतिसमो भवेत् ।। अर्थात् चार लाखके सङ्ख्यामे मन्त्र जपलाके बाद इ मन्त्र सिद्ध होजाई तथा आदमी एकर सिद्धि प्राप्त करे सकगइल त उ आदमी देवगुरु वृहस्पति समान होजाई ।

एहे महापुराणमे याज्ञवल्क्य ऋषिद्वारा भगवती सरस्वतीके स्तुति वर्णन कइल गइल बा, जउन स्तुतिसे भगवती सरस्वती प्रसन्न होके अराधकके मनोवाञ्छित अभीष्ट प्रदान करेलिन– याज्ञवल्क्यकृतं वाणीस्तोत्रमेतत्तु यः पठेत् । स कवीन्द्रो महावाग्मी बृहस्पतिसमो भवेत ।। महामूर्खश्च दुर्बुद्धिर्वर्षमेकं यदा पठेतेत । स पण्डितश्च मेधावी सुकवीन्द्रो भवेद् ध्रुवम् ।। अर्थात् जे याज्ञवल्क्यद्वारा रचित इ सरस्वती स्तोत्रके पाठ करी, उ बृहस्पतिके समान महान् विद्वान होजाइ । यदि कवनो महान् मूर्ख तथा दुर्बुद्धिभि वर्ष दिनतक नियमपूर्वक एकर पाठ करी त निश्चय हि पण्डित, मेधावी तथा कवि होजाइ ।

श्रीपञ्चमी अथवा सरस्वतीपूजाके दिन धर्तीमाताके विधिवत् पूजा करके निदसे उठावलजाला । जेकराके भोजपुरी भाषामे ‘हरवत’ कहलजाला । हरवत कहल खास भूमिपूजनके हि रूप ह । हरवतके दिन हर बैलसे मुख्यतः खरियान जइसन जगहपर जोतलजाला तथा धर्तीमाताके उठलाके खुशियालीमे सिर्नी (भिजावल चावलमे मिठा मिलाके तयार कइल प्रसाद विशेष) बाटलजाला । इहे दिन खेतीके काममे प्रयोग होखेवाला औजारनके लोहारके आरनमे लेजाके तेज तथा धारदार बनावलजाला । गर्मीमौसममे लगावेवाला बाली खातिर खेतके खनजोत करेखातिर औजारनके तम्तयार राखहिके पडेला । इ काम खातिर लोहारके मजदुरीबाहेक दक्षिणा भि दिहल आवश्यक होला । इहे दिन गृहस्थलोग बसन्त आगमनके सुखद उपलक्ष्यमे आपन कुलदेवताके अबिर चढावेके परम्परा बा । चाहे कुछोहोवे माता सरस्वतीके पूजनके दिन विद्यार्थी, शिक्षक तथा सम्पूर्ण विद्वानलोगके मुहसे अनायास निस्सरण होखे वाला शव्द ह – वाग्देव्यै नमो नमः ।

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