नेपालके राजनीति आ राष्ट्रपति


मुलुकमे एहबेरा चारगो शक्ति बा । सरकार, विपक्षी दल, राष्ट्रपति कार्यालय आ नागरिक समाज । ई चारु शक्ति मिलके निकास देवेके उल्टा एहबेर चारु शक्ति चारो दिशामे खडाभइल बा । चारु शक्ति चारओरी रहलासे गतिरोध जटिल बन्ते जारहल बा । ई चारो शक्तिके वर्तमान भूमिका देखलापर सरकार आपन कुर्सी बचावेमे लागल बा त विरोधी दललोग केतरे सरकार बनावल जाव जइसन सत्ता स्वार्थमे लागल बा । नागरिक समाज मौन धारण कइले बा त राष्ट्रपति विभिन्न पक्षलोगसे सल्लाह करत आपन भूमिका पहिचान करेमे लागल बाडन । सरकार निर्वाचित प्रतिनिधि बाहेकके सत्ता नादेवेके जिद्द लेवेके, अन्य दलके विमतिमे निर्वाचन करेके हल्ला फैलावेके तथा पूर्व पदाधिकारीलोगके सेवा सुविधाके नाममे राज्यके तिजोरी अनावश्यक खर्चकइलासे सरकार आपन आयु बढावेला आ आपन समर्थक बढावेमे लागल बा स्पष्ट होता ।

जेठ १४ मे निर्वाचित संविधानसभा विघटन भइलाके बाद राजनीतिक गतिरोध जटिल बन्ते जारहल बा । दललोगके बीच बढ्त गइल अविश्वासके कारण झल्दीये निकास निकलेके सड्ढेत भि नइखे, तथापि निकास नादेके नेतालोग जनमैत्री नाबनेसकि । यद्यपि राष्ट्रपति, सरकार तथा सभि दल जबतक नामिलि तबतक निकास किमार्थ सम्भव नइखे । बल्की अउरो बलझत जा सकता । अन्ततः अस्तित्वमे रहल दुनु वैधानिक निकाय राष्ट्रपति कार्यालय आ मन्त्रिपरिषद् इहे मिलके मुख्य भूमिका निर्वाह करेके पडि आ न्यायालय सकारात्मक होखेके पडि ।

राष्ट्रपति डा. रामवरण यादवके विवादमे तानेवाला क्रम नइखे रुकल । ए. माओवादी नेता डा. बाबुराम भट्टराई नेतृत्वके ए. माओवादी संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चा सम्मिलित साझा सरकार अध्यादेशमार्फत् लेआइल कुछ विधेयक राष्ट्रपतिके लगे स्वीकृतिखातिर पठावल गइल बाकि राष्ट्रपतिद्धारा विधेयक फिर्ता पठावल गइल अथवा विचार नाकइलाके कारण एगो वकिलके आगह्रमे सर्वोच्च अदालतले राष्ट्रपति कार्यालयके कारण देखाऊ नोटिश जारी कइल गइल । राष्ट्रपतिद्धारा अध्यादेश स्वीकृत नाकरके संविधान विपरीत काम भइलबा कहके आरोप लगावल गइल बा । राष्ट्रपति कार्यालयउपर कारण देखाऊ नोटिश जारी होखल मामुली बा नाह । उनकाद्धारा कारण देखाऊ आदेशके जवाफ देवेके भा नादेवेके दुनु विषय नैतिकताके परिधिमे आई । चाहे सर्वोच्च अदालतद्धारा उनकापर लागल आरोपमे राष्ट्रपति कार्यालयके विजयी करवलाके बादभि ई बात राष्ट्रपति खातिर शोभनीय विषय होखेवाला नइखे । राष्ट्रपतिउपर कोइद्धारा आरोप लगावल बात सामान्य नाह । राष्ट्रपति आपन बोलीके कारण पटक–पटक विवादमे परत आइल बाडन । आपन बोलल कुछ बातसे स्वयं उनके पछाडि पडेके पडल बा । राष्ट्रपतिके कार्यशैलीके निष्पक्षता एवं भूमिकाउपर अंगुली उठावल स्वयं राष्ट्रपति पद खातिर उपयुक्त नाह ।

बजेटपर चलल राजनीतिक असहमतिके मामिलामे राष्ट्रपतिके धन्यवाद देवहिके पडि उ विभिन्न दबाबके बावजुद नाकइलासे नाहोखेवाला, जरुरी बजेट अध्यादेशमे कवनो अवरोध खडा नाकइलन । यद्यपि बजेट आवल त्रुटिपूर्ण होसकता, पर उ अनिवार्य रहे । बासी खाना खाएके नाहोला कहल बात जेतना सत्य बा, ओसे बेसी सत्य ह भुखसे मरेवाला आदमीके बासी भातहि काहेना होखे खाए देके जान बचावल । सरकार उहे कइलस आ राष्ट्रपतिभि ओकराके ठिक समझके आपन विवेक शीलताके उदाहरण प्रस्तुत कइलन । लोकेकतान्त्रिक शासन पद्धतिके जान निर्वाचन ह । निर्वाचनबिना लोकतन्त्र नाचलेसकि । निर्र्वाचनबिना चलल लोकेकतन्त्र आइसियुमे राखल व्यक्ति सरह ह । अभि नेपालके लोकेकतन्त्र आइसियुमे राखल बा ।

विपक्षी दललोग राष्ट्रपतिके केतनो उस्कइलाके वावजुद राष्ट्रपतिद्धारा कवनो कदम नाउठावल बुद्धिमानी होइ । राष्ट्रपतिद्धारा सरकारविरुद्ध कवनो कदम उठावेके सोच नाबनावल स्वागतयोग्य मात्र नाहोई, मुलुकके जनचाहना अनुकूल भि होइ । राष्ट्रपतिके सल्लाहकारलोग के भि धन्यवादके पात्र कहिके पडि । राष्ट्रपतिद्धारा अपने कुछो नाकरके सबलोगके सहमतिमे आवेके दबाब दिहल वास्तवमे सही अभिभावकत्व ह । राष्ट्रपति खोपीके राजा सरह नाबइठिहन अभिव्यक्ति संवैधानिक हैसियतसे उपर ह । अभिभावकके आम जनताके अपेक्षासे उपर गइल ठिक भि नाहोला । राजा ज्ञानेन्द्रभि इहे सीमा पार कइलेरलन २०६१ माघ १९ गते । फलस्वरूप २३८ वर्षके संस्था समाप्त होगइल । भलके बच्चा जइसन चलेके शुरुआत कइल गणतन्त्रके रक्षाखातिर भि राष्ट्रपतिके संवैधानिक सीमाके खयाल राखेकेपडि । अइसन भूमिकासे देरेसे सहि मुलुकके निकास मिल सकता । हडबडमे लिहल निर्णयसे मुलुकके शान्ति, अमन चयन आ लक्ष्य अउरी दुरहोखेके निश्चित बा ।

निकास निकलेवाला दुगो निकाय प्रधानमन्त्री आ राष्ट्रपतिबीच सङ्घर्ष करावेके रणनीति भि निकासके बाधक ह । यद्यपि प्रधानमन्त्री आ राष्ट्रपतिबीच चलल अभिव्यक्तिसे भि शक्ति सङ्घर्षके सम्भावना देखवले बा । प्रधानमन्त्रीके बारम्बार २०६१ माघ १९ के याद दिलवलासे राष्ट्रपतिके कुछो नाकरे खातिर अप्रत्यक्ष चेतावनी दिहल लागता त राष्ट्रपतिद्धारा भि विभिन्न व्यक्तिसे निरन्तर छलफल करके तथा सरकारके सहमतिमे अगाडि बढ्ेके सल्लाह देके अप्रत्यक्षरूपमे हमहु कुछ करसकेम सड्ढेत दिहल बुझाता । ऐसे दुनु निकायबीच सहकार्यके अभाव लउकता । जउन एकदम दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था ह ।

अभिके प्रमुख अवरोध कहल संविधानके धारा ३८ चलायमान नाभइल ह । संसद्जइसन संवैधानिक निकायके अभाव भइल ह । अभि संवैधानिक निकायके गठन होखेके अवस्था नइखे, जेकराचलते संवैधानिक निकाय आपन कार्य सम्पादन नइखे करसकत । अइसन अवस्थाके संवैधानिक गतिरोध कहलजाला । अइसन संवैधानिक गतिरोध हटावेके वैधानिक उपाय कहल बाधा अडकाउ फुकाउ अवस्था ह । बाधा अडकाउ फुकाउ संवैधानिक प्रावधान अइसने परिस्थितिखातिर राखलजाला । संविधानके धारा १५८ मे ई प्रावधान बा । संविधानके धारा १५८ के प्रावधान देखलापर बाधा अडकाउ फुकाउ अधिकार बा, बाकि राष्ट्रपति आ मन्त्रिपरिषद् दुनुके मिलके करेके पडि । एकरा खातिर धारा १५८ अनुसार सरकारके पहिलका निणर्य करेके पडि त राष्ट्रपतिके बादमे । धारा ३८ के चलायमान बनावे खातिर मन्त्रिपरिषद् निर्णय करी त अन्य दललोग अपने सहभागी होइहे । सरकारके नया“ संसद् गठन करेके भा विगठन भइल ससंद् पुनः स्थापना करेके निणर्य लेवेके पडि । एसे संविधान निर्माणमेहि खालि सहयोग नामिलि, नया“ निर्वाचन करावेमे भि सहयोग पुगी । सरकारद्धारा निर्वाचन करावेके काम भि बिना संसद् सम्भव नइखे । यसर्थ तदर्थ हि काहेना होखो संसद् त चाहि । एसे सबके आधार मिलि । चारु शक्ति मिलके ठोस सहमति करेके पडि आ उ सहमतिके मन्त्रिपरिषद्द्धारा पारित कके बाधा अडकाउ फुकाउ विधेयकके रूपमे पारित करके राष्ट्रपतिसमक्ष पेश करेके पडि । तब राष्ट्रपति बाधा अडकाउ फुकाउ आदेश जारी करिहन ।

संविधानसभाके अवसानपश्चात् राष्ट्रपतिके उक्साके अथवा महत्वाकांक्षी बनाके आपन अभीष्ट पूरा करावेके चाहेवाला शक्तिलोग राष्ट्रपतिके विवादमे लियवलस । राष्ट्रपतिभि अपनाके बढका शक्तिशाली बुझलन । देशके अन्तरिम संविधान राष्ट्रपतिके कार्यकारी अधिकार नइखे दिहले । उनकर पद बेलायतके महारानी आ भारतके राष्ट्रपति जइसन आलड्ढारिक बा । राजा ज्ञानेन्द्र भि संविधानके संरक्षके रहले, बाकि आपन हातमे कार्यकारी अधिकारी लेवेके प्रयास कइले, लेले । नतिजा प्रस्टे बा । अकल्पनीय अवस्था उत्पन्न भइल आ देशसे २४३ वर्ष पुराना राजसंस्थाके बिदाइ भइल । वर्तमान राष्ट्रपतिके भि देशके संविधान संरक्षकके भूमिकामे रखले बा । संरक्षकके अर्थ संविधानके रक्षा कइल ह । संविधानके व्याख्या करेके अधिकार सर्वोच्च अदालतके बा । सरकारके काम संिवधान कार्यान्वयन करे करावेके ह । तसर्थ वर्तमान जटिल अवस्थामे राष्ट्रपतिद्धारा सर्वोच्च अदालतके परामर्श अनुसार अगाडि बढ्ल हि उपयुक्त होई ।

संविधानसभा विघटन, निर्वाचन, व्यवस्थापिका संसद् सर्वोच्च अदालतके ‘रोड म्याप’ ह । यदि सर्वाेच्च अदालतद्धारा ६ महिनासे ज्यादा संविधानसभाके म्याद थप नाकरेके कठोर आदेश जारी नाभइल रहित त देशके राजनीति अभियो भि अन्योलग्रस्त हि रहेवाला रहे आ अन्तरिम संविधानके नाममे देश लुटेवाला काम जारिये रहित । राष्ट्रपतिके सर्वोच्च अदालतहि वर्तमान समस्याके निकास सम्बन्धमे समुचित सुझाव देसकि काहेकि संविधानके व्याख्या करेके अन्तिम अधिकार ओकरे ह । सर्वोच्च अदालतबाहेक राष्ट्रपति, मन्त्रिपरिषद्, निर्वाचन आयोग भा कवनो दोसर निकायके मनमानिढंगसे प्रचलित संविधानके व्याख्या करेके अधिकार प्राप्त नइखे । प्रायः सम्पूर्ण महत्वपूर्ण विषयमे राष्ट्रपतिके मन्त्रिपरिषद्के सुझाव आ सल्लाह मानल उनकर पदीय दायित्व ह ।

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