कवनो वस्तुके रस खींचिके अपनावल क्रिया के हि शोषण कहल जाला । समय, काल आ परिस्थिति अनुसार शोषण करेके तरिका बदल गईल बा बाकि शोषण करेवाला संस्कार नइखे बदलल । पहिले मालिक मजदूर के साथ शोषण करत रहे त अब मजदूर मालिक के साथ शोषण करता । शोषणके बोलबाला चारुओर बा । राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक जइसन हरेक क्षेत्रमे शोषण के राज बा । जेकरा लगे तनि पावर आ जाता उ अपनासे छोट के शोषण करे लागता । समयके चक्र जइसे घुमेला ओइसहि शोषित व्यक्तिके दिमागो घुमेला जेकर परिणाम समाजमे अशान्ति फैलजाला । प्राकृतिक गुण अनुसार हरेक व्यक्तिमे कुछो ना कुछो खुबी जरुरे रहेला । जवन व्यक्तिलगे जवन खुबि बा उ उहे हथियारसे दोसराके शोषण करेला जइसे नेता अपन भाषणसे, दौलतवाला अपन धनसे, तकतवाला अपन ताकतसे, बुद्धिवाला अपन बुद्धिसे आ रुपवाला अपन रुपसे । अपवादके छोडके हरेक व्यक्ति केकरो ना केकरो त जरुर शोषण करेला जइसे मास्टर विधार्थीके, बाप बेटाके, पति पत्नीके, वकिल झगडियाके, डाक्टर रोगिके । समाजमे व्यक्ति अनेक रुपमे जियत बाचत बा आ साथे साथ शोषण करता त शोषित भि होत रहता । ई परम्परा ऐसे कायम बा कि ऐमे समाज के हरेक वर्गके हाथ बा । जब केकरो हाथमे कवनो मौका आवेला त उ तुरन्त मौकाके फाइदा उठालेवेके चाहेला ।

निष्कर्श ई बाकि हमनियो के समयके साथ आगा बढेके बा आ ढेकेला–ढकेलउवल छोडके अपना सम्पर्कमे रहल हरेक व्यक्तिके हाथमे हाथ मिलाके सहयोग करेके चाहि । शोषण जइसन कु–संस्कारके छोडेके पडि । ऐसे हमनिये के भलाई बा ।

२०५१ साल भाद्र १० गते सगुनमे प्रकाशित

  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *