भगवान सूर्य/भासकर के उपासना के महान पर्व ह छठ । मूलतः सूर्य षष्ठी ब्रत भइलाके कारण इ पर्वके छठ कहलजाला । पारिवारीक सुख–समृद्धि आ मनोवांछित फल पावे खातिर इ पर्व मनावल जाला । पुरुष आ महिला दुनुकोई समानरुपसे इ पर्व मनावेला । छठ ब्रतके सम्बन्धमे अनेक कथा प्रचलित बा, ओमेसे एक कथाके अनुसार जब पान्डव आपन सारा राजपाट जुवामे हारगइल तब द्रौपतीजी छठ ब्रत कइलिन । तब उनकर मनोकामना पुरा भइल आ पान्डवके आपन राजपाट फिर्ता मिलगइल । लोकपरम्पराके अनुसार सूर्य देव आ छठी मईया के सम्बन्ध भाई–बहिनके ह । लोक मातृके षष्ठी के पहिलका पूजा सूर्यदेव हि कइले रनी ।

हालांकि इ पर्व मुख्य रुपसे नेपालके तराई क्षेत्रमे बडा धुमधामसे मनावल जाला, बाकि इहा के मूल निवासी जे हिमाली आ पाहाडी जिल्लामे बसोबास करेला उहो छठ पर्व मनावेला ।

ई त्योहार चार दिन तक चलेवाला महापर्व ह । एकर सुरुवात कार्तिक शुक्ल चतुर्थी के होला तथा समाप्ती कार्तिक शुक्ल सप्तमी के होला अर्थात भैयादूजके तीसरका दिनसे एकर सुरुवात होला । इ दौरान केतनालोग छत्तीस घण्टाके कठिन ब्रत रखेला आ अन्न जल भि ग्रहण नाकरेला । सामान्यतया पहिलका दिन सैंधा नून, घीसे बनल अरवा चाउर आ लौकाके सव्जी प्रसादके रुपमे ग्रहण कइलजाला । अगीलादिन से उपवासके शुरुवात होला । उ दिन रातमे खिर बनावल जाला । ब्रतधारी रातमे इ प्रसाद लेला । तीसरका दिन डुबत सूर्यके अध्र्य यानी दुध अर्पण कइलजाला । अन्तिम दिन उगत सूर्यके अध्र्य चढावलजाला । इ पूजामे पवित्रताके बहुत ज्यादा महत्व दिहलजाला । पूजा अवधिमे लहसून, प्याज वर्जित यानी मनाही बा । जउन घरमे इ पूजा होला, उहा भक्तिगीत गावलजाला पूजाके तैयारी खातिर सबलोग मिलके रास्ताके सफाई करेला ।

पहिलका दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी “नहाय–खाय” के रुपमे मनावलजाला । सबसे पहिले घरके सरसफाई करके ओके पवित्र बनालेहलजाला । एकराबाद छठब्रती नहाके पवित्र तरिकासे बनावल शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कके ब्रतके शुरुवात होला । घरके सभि सदस्य ब्रतीके भोजनोपरान्त ही भोजन ग्रहण करेलन । भोजनके रुपमे लौका, दाल आ चावल ग्रहण कइलजाला । दाल चनाके होला ।

दोसरका दिन कार्तिक शुक्ल पंचमीके ब्रतधारी दिनभर उपवास रहलाके बाद सांझके भोजन करेला । एकराके “खरना” कहलजाला । खरनाके प्रसाद लेवे खातिर अगलबगलके सभिलोगके निमन्त्रित कइलजाला । प्रसादके रुपमे मिठासे बनावल चावलके खीरके साथ दुध, चावलके पिट्ठा आ घि के रोटी बनावल जाला । एमे नुन आ चिनीके उपयोग नाकइलजाला । घरके स्वच्छताके पूरा ध्यान रखलजाला ।

तिसरका दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठीके छठके प्रसाद बनावलजाला । प्रसादके रुपमे ठेकुवा (कुछलोग एकरा टीकरी भि कहेला), चावलके लड्डु जेकरा लडुवा भि कहलजाला बनेला । एकरा अलावा चढावाके रुपमे लियावल गइल सा“चा आ फल भि प्रसादके रुपमे सामिल होला ।

सांझके पुरा तयारी आ व्यवस्थाकरके बांसके टोकरीमे अघ्र्यके सुपली सजावल जाला आ ब्रतिके साथ परिवार आ पडोसके लोग अस्ताचलगामी सूर्यके अघ्र्यदेवे घाटके तरफ चलदेवेला । सभी छठब्रती एक नीयत तालाब, पोखरा या नदीके किनारे जम्मा होके सामुहिक रुपमे अघ्र्य दान सम्पन्न करेला । सूर्यके जल आ दुधके अघ्र्य दिहलजाला तथा छठी मैयाके प्रसादसे भरल सुपलीसे पुजा कइलजाला । इ दौरान कुछ समयला मेलाके दृश्य बनजाला ।

चौथा दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमीके सवेरे उदयिमान सूर्यके अघ्र्य दिहलजाला । ब्रती फेरु उहे जम्मा होला जहा उ सांझके अघ्र्य देले रहे । फेरु पछिलका सांझके प्रकृयाके पुनरावृति होला । अंतमे ब्रति कच्चा दुधके शरबत पीके तथा तनी प्रसाद खाके ब्रत पुरा करेला ।

एगो कथाके अनुसार राजा प्रियवदके कवनो सन्तान नारहे, तब महर्षि कश्यप पुत्रेष्टि यज्ञ कराके उनकर पत्नी मालिनीके यज्ञाहुती खातिर बनावलगइल खीर देहलन । एकर प्रभावसे उनका पुत्र प्राप्त भइल बाकि उ मृत पैदा भइल । प्रियवद पुत्रके लेके श्मशान गइलन आ पुत्रवियोगमे प्राण त्यागे लगलन । ओहि समय भगवानके मानस कन्या देवसेना प्रकट भइलिन आ कहलिन कि सृष्टीके मूल प्रवृतिके छठा अंषसे उत्पन्न भइलाके कारण हम षष्ठी कहलानी । हे राजा तु हमर पुजा कर तथा अउर लोगके भि पुजा करेके प्रेरीत कर । राजा पुत्र इच्छासे देवी षष्ठीके ब्रत कइलन आ उनका पुत्र रत्नके प्राप्ती भइल । इ पुजा कार्तिक शुक्ल षष्ठीके भइल रहे ।

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