कविवर माधवप्रसाद देवकोटाको बारेमा संस्मरण माग्दा दिनेले महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटाको संस्मरण लेखी पठायो भने नै भन्ने ? सुखद संयोग ? हिन्दी साहित्यका विद्वान् सर्जक एवं समालोचक डा. प्रभावकर माचवेले यस्तै गरे जानीजानी वा झुक्किएर गरे उनै जानुन् ।
पाल्पामा २०३६ साल वैशाख ६ गते कविवर माधवप्रसाद देवकोटाको ७५औँ वर्षको अवसर पारेर विशेष अभिनन्दन कार्यक्रम आयोजना हुँदै थियो । कविका सम्पूर्ण कृतिहरूको प्रकाशन गर्ने, कविका बारेमा रचनाहरूको अभिनन्दन गर्ने, कविलाई प्राप्त नेपालका ख्यातिप्राप्त साहित्यकारहरूको पत्र र प्रशंसा प्रकाशित गर्ने, राष्ट्रिय कविगोष्ठी, कविको व्यक्तित्व र कृतित्वको बारेमा गोष्ठी, साहित्यकार र साहित्यप्रेमीहरूले कविलाई डोलामा राखेर बजार परिक्रमा गराउने र खुलामञ्चमा नागरिक अभिनन्दन गर्नेजस्ता कार्यक्रमहरू राखिएका थिए । विभिन्न कार्यक्रमको जिम्मा विभिन्न समितिहरूलाई दिइएको थियो । मूल समितिको सचिव र पुस्तिका तथा स्मारिका प्रकाशन उपसमितिको संयोजक म थिएँ ।
अभिनन्दन ग्रन्थ प्रकाशनका लागि नेपालका नामी साहित्यकारहरूको मन्तव्य, लेख रचना, संस्मरण लिनको लागि पत्राचार गरेँ । कविवरसँग रहेका नेपालका साहित्यकारहरूका चिठीहरू, जस्तै कथाकार गुरूप्रसाद मैनालीले वि.सं. १९९१ मा वाग्लुङ बजारबाट लेखेको चिठी, नाटककार बालकृष्ण समले वि.सं. १९९९ मा लेखेको उहाँहरूकै हस्ताक्षरको लेखौट र खामसमेतको चिठी तथा कविशिरोमणि लेखनाथ पौड्याल, कवि सिद्धिचरण श्रेष्ठ, केदारमान व्यथित, भीमनिधि तिवारी, समालोचक रामकृष्ण शर्माका पत्रहरू देखेर उत्साहित भएको थिएँ । भारतका संस्कृत साहित्यका केही विद्वान्हरूको पनि पत्र भेट्टएिका थिए । यसै मेसोमा कवि देवकोटाको सम्बन्ध भारतको पुणे र वनारसका संस्कृतका विद्वान्हरूसँग थियो भन्ने थाहा थियो । कविको बारेमा थप मन्तव्य र लेख रचना मागी मैले नेपाल र भारतका केही साहित्यकार र विद्वान्हरूसँग पत्राचार गरेँ । जवाफमा प्राप्त भयो हिन्दी साहित्य लेखक तथा समालोचक डा. प्रभाकर माचवेको पत्र । पत्र पढेर हामी छक्कै पर्यौँ । मेरो गल्ती कहाँ भयो कुन्नी मैले अझै बुझ्न सकेको छैन तर डा. माचवेले कविवर माधवप्रसाद देवकोटाको सट्टा महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटाको संस्मरण लेखी पठाए । हिन्दीमा लेखिएको उक्त पत्र यस्तो छ ः
डा. प्रभाकर माचवेको पत्र
स्थायी ठेगाना ः भ् – ज्ञडण्, ग्रेटर कैलास, क्ष्क्ष्, नई दिल्ली ज्ञज्ञण्ण्द्धड
ज्ञज्ञ – द्द – ठढ
प्रिय वन्धु,
आपका द्दघ – ज्ञ – ठढ का पत्र मिला । देवकोटाजीके अभिनन्दनमें आप ग्रन्थ प्रकाशित कर रहे हैं, यह समाचार पाकर हर्ष हुआ । संप्रति मैं दिल्ली छोडकर दो वर्ष के लिए कलकत्ता जानेकी व्यस्तामें लगा हूँ । अतः एक छोटा लेख भेज रहा हूँ । क्षमा करें । ज्ञड फरवरीके बाद मेरा पता रहेगा ः
निदेशक,
भारतीय भाषा परिषद्
घट, शेक्सपियर सरणि,
कलकत्ता – ठण्ण्ण्ज्ञठ
अभिनन्दन ग्रन्थ वहीं भेजें ।
सप्रेम
-डा.) प्रभावकर माचवे
-स्व.) नेपाली महाकवि देवकोटा की स्मृति में –
देवकोटाजीका नाम सबसे पहले महापंडित राहुल सांकृत्यायनसे सुना । मैं दार्जिलिंग सन् ुद्धढ या ुछण् की छुटि्टयोंमें गया तो वहाँ पं. सूर्यप्रसाद ज्ञँवाली -सूर्यविक्रम ज्ञवाली) और डा. पारसमणि प्रधान और धरणीधर शर्माजी मिले थे । वहीं नेपाल साहित्यसे विशेष परिचय प्राप्त हुआ । भानुभक्तकी रामायण पढी । प्रो. ईश्वरी बरालने मेरा व्याख्यान रखा – हिंदी, नेपालीमें कवितायें प्रयोगोंकी चर्चा, मेरे परिचयमें की । बादमें डा. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ काठमांडूमें सांस्कृतिक सचिव थे, भारतीय दूतावासमें, तब उनसे भारतमे उनके लौटनेपर ‘दूध भात डुकु’ कविता सुनी । इसके बाद डौम मौरेसका ‘गौन अवे’ में ‘ए पोएट इज डाइंग’ करुण -?) अध्याय पढा । ‘अतीतसे वर्तमान’ में पं देवकोटापर राहुलजीका निबंध पढा । हालमें डा. पारसमणि प्रधानजीकी अंग्रेजी पुस्तककी भूमिकाके रूपमें मैंने कुछ शब्द लिखे हैं । उसका हिन्दी अनुवाद होना शेष है ।
सबसे अविस्मरणीय है ज्ञढछट में अप|mो-एशियाई लेखक सम्मेलनमें नई दिल्लीमें देवकोटाजीके आगमनपर उनसे भेट । उनकी वक्तृता सुनकर मुझे ‘निराला’ जीकी -हिंदीका महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ इ. सन् १८९६ – १९६१ – विनय) याद आई ः इतनी विदग्धता और साथही इतनी मौलिकता Û संस्कृत, अंग्रेजी, बँगला की श्रेष्ठ कविताएँ दोनोंने पढी थी । दोनोंकी घोर उपेक्षा, उनके जीवनकालमें हुई । दोनोंको आर्थिक संघर्ष करना पडा । दोनों क्रान्तिकारी भावनासे उत्प्रेरित थे । नेपाली एम्बेसी, नई दिल्लीमें देवकोटाके स्वागतमें पार्टी हुई । साक्ष्य है एक फोटोग्राफ, जिसमें देवकोटाजी, अमृता पि्रतम, ईश्वरी बराल, मैं आदि खडे हैं – मेरी आत्मकथा ”प|mाम सेल्फ टु सेल्फ” -विकास प्रकाशन गृह, असफ अली रोड, दिल्ली -द्द) में पर -?) छपा है ।
महाकवि देवकोटाजीकी कवितामें मुझे तीन विशेषताएँ मोहती हैं ः प्रकृतिको वे खुली आँखोंसे देखते हैं । सृष्टिकी उत्फुुल्ल -?) ताजगी उनके छंदोंमें प्रतिबिंबित होती है । यह गुण कालिदास और रवींद्रनाथमें था । प्रकृतिका सौंदर्य कविके लिए एक चिरंतन विस्मयका विषय है । परंतु कवि उसमें खो नहीं जाता । ‘प्रसाद’ -हिंदीका विख्यात छायावादी कवि जयशंकरप्रसाद, जन्म इ.सं. १८८९-१९३७-विनय) के ‘ले चल नाविक मुझे भुलावा देकर धीरे धीरे’, या ‘दुनियाकी शो…शोंसे उकता गया हूँ यारव’ यह उर्दू कविकी या मराठी कवि माधव जूलियन् -इ.सं. १८९४-१९३९ – विनय) की ‘तेर्थ चल राणी’ जैसा पलायनवाद, प्रकृतिको विस्मृतिकी अफीम या क्षणिक मूर्छना का आलंबन देवकोटा नहीं बनाते । वे प्रकृति और मानवको अभिन्न मानते हैं । मावनवादकी इसी साधानाके कारण वे आल्मास -?) की गरिबी, कष्ट-सहन, आर्थिक वर्गभेदसे पीडित होते हैं । यहाँ उनमें रुसी कवि माइकौवस्की, या बाँग्ला कवि काजी नजरुल इस्लाम या हिंदी कवि मुक्तिबोध -या परवर्ती ‘निराला’) की विप्लवी वृत्ति लक्षित होती है । उनकी तीसरी सबसे बडी खूबी भाषा और छन्दोंके साथ निरंतर प्रयोगशीलता । उनके अतृप्त ओर असंतुष्ट मनकी ‘तालाबेली’ -तिलमिलाहटके लिए मीराबाईका राजस्थानी शब्द) उनमें व्यक्त है । पश्चिमके आधुनिकतम आलोचक रेने वेलेकने श्रेष्ठ काव्यका प्रतिमान ‘टेन्सन’ -तनाव) माना है । वह देवकोटाकी रचनाओंमें विपुल प्रमाणमें है । उनकी संकलित रचनाएँ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओंमें शीघ्र प्रकाशित होनी चाहिए ।
भारत-नेपाल सीमापर आपकी संस्था, यह साहित्यिक परस्पर विनिमयका कार्य और अच्छी तरह कर सकते हैं । देवकोटाकी जीवनी और काव्यपर प्रामाणिक, आधिकारिक, सस्ती और सर्वसुलभ सुंदर हिंदी पुस्तकोंके प्रकाशनकी आशा रखता हूँ । मैं तो अब साहित्य अकादेमीसे ज्ञढठछ में ही सेवानिवृत्त हो गया । मेरे हाथमें कोई सत्ता, संपत्ति, अधिकार नहीं । केवल शुभकामनाएं दे सकता हूँ ।
