नेपालके अन्तरिम संविधान २०६३ के धारा २० मे महिलाके हक, धारा २१ मे सामाजिक न्यायके हक, धारा १९ मे सम्पत्तिके हक, धारा १८ मे रोजगारी तथा सामाजिक सुरक्षाके हक, धारा १३ मे समानताके हकसम्बन्धी संवैधानिक हक, संविधानके प्रस्तावना, राज्यके निर्देशक सिद्धान्त तथा नीतिमे महिलाके हक अधिकार एवं समाजिक सुरक्षाके स्पष्ट व्यवस्था कइलाके बाद भि राज्यद्धारा महिला हिंसा नारोके सकला से संविधानके व्यवस्थासब कागजेमे सीमित होगइल बा । महिलाबिरुद्ध होखेवाला हिंसा जेतरे, जेतना हो रहलबा्, उ सब महिलाके हक अधिकार आ मानव अधिकार के बर्खिलाप बा । एसे जेतना भि महिलालोग प्रभावित होखेला उ सब आधारभूत चिज जइसे खाना, कपडा, रहेके स्थान, शिक्षा, स्वास्थ्यजइसन आधारभूत आवश्यकतामे स्वतन्त्र बाचेके अधिकारसे वञ्चित रहेलन । नेपालके संविधान जउन परिकल्पना हि नइखे कइले ओइसन हिंसासे अनाहक नेपाली महिलालोगके इ धरती छोडेके पडरहल बा । ओहुमे इ हमनी जइसन विकट गावे गावसे भरल मुलुकमे महिला हिंसा अन्त्य करेवाला अभियानके सन्देश समेत मालुम नाभइल स्थिति होखेके पडि ना त कमे उमेरमे विवाह करेके, बच्चा जन्मावेके समयमे ज्यानके जोखिम मोलेके, दहेज पुरा नाकइल बहानामे जिवते जलेके, दिनानुदिन झगडा पिटाइ खाएके, बिना गल्ती मरेके जइसन विषम अवस्थामे कुछो त कमी आइत? महिला हिंसाबिरूद्धके अभियान विश्वभर मनावलाके वावजुद भि हमनीके देशके सहर केन्द्रित अभियानके कारण विकट गाव वस्तीके नेपाली दिदीबहिनलोगके ‘लिख लोढा पर पत्थर’ जइसन भइल बा आ हिंसा रुकेके कवनो आसार नइखे दिखत, उल्टे महिला हिंसा बढ रहल बा । ओहिसे ई अभियानके सहर मात्र केन्द्रित करके अभियान चलाके वास्तवमे समग्र ग्रामीण महिलालोगके समस्या जहा के तहा रहके इ अभियान कवनो प्रभाव करी जइसन नइखे लउकत । जउन ठावमे इ बातके प्रभाव परेके चाहि उ ठावमे सूचना नइखे पुगेसकत, जेकरा चल्ते महिला हिंसाबिरूद्धके अभियानके हरेक गाव गावमे पहुचाएके पडि । ओहिसे सत्ता मोह आ भत्ता मो हके अन्त्य करके राज्यद्धारा हि महिला हिंसा रोके खातिर समयमे ध्यान देहल जरुरी बा ।
नेपालके केन्द्रीय तथ्याड्ढ विभागद्धारा ‘कोही नाछुटो, कोही नादोहराव’ कहल नाराके साथ २०६८ सालके असार महिनामे सम्पन्न कइल ११ औँराष्ट्रिय जनगणनाके अन्तिम नतिजा १७ महिनाके अन्तरालकेबाद गत अगहन ११ गते सार्वजनिक भइल । प्रस्तुत जनगणनाअनुसार नेपालके जनसङ्ख्या दु करोड ८४ लाख १६ हजार देखइले बा, जेमे विदेश मे गइल नेपालमे छ महिनासे ज्यादा समयखातिर अनुपस्थित रहल कहलगइल १९ लाख २१ हजार चार सय ९६ जना के भि सामेल कइलगइल बा । तथ्याड्ढ विभागके जनसङ्ख्यासम्बन्धी ताजा प्रतिवेदनअनुसार वैदेशिक रोजगारी आ अउर कवनो सिलसिलामे विदेश नागइल आ इहे देशमे विभिन्नरूपमे जीवन गुजारा कररहल नेपालीके कुल सङ्ख्या दु करोड ६४ लाख ९४ हजार पाँच सय चार रहल बा । इहे आँकडाके तथ्याड्ढ विभाग नेपालके जनगणना कहके सार्वजनिक कइले बा । इ जनगणनाअनुसार नेपालमे महिलाके जनसङ्ख्या एक करोड ३६ लाख ४५ हजार चार सय ६३ बा । इ संख्या कुल अनुपस्थित जनसङ्ख्या बाहे कके नेपालीके ५१.५ प्रतिशत होता । (एमे तथ्याड्ढद्धारा अनुपस्थित जनावल नेपालीके सङ्ख्यामध्ये १२.३ प्रतिशत महिला के जोडल नइखे गइल) । प्रस्तुत तथ्याड्ढअनुसार पुरूषके जनसङ्ख्या एक करोड २८ लाख ३९ हजार ४१ अर्थात् ४८.५ प्रतिशत रहल बा । देखलजाव त पुरूषके सङ्ख्या नेपालमे वसोवास कररहल महिलाके तुलनामे तीन प्रतिशत कम होखता । अनुपस्थित जनसङ्ख्यामे महिलाके सङ्ख्या कम भइल, ने पालमे वसोवास करेवालामे बेसी महिला होखल आ उर्वर उमेर के अर्थात् सक्रिय जनसङ्ख्या विदेश गइलासे जनसङ्ख्या वृद्धिदर २.५ प्रतिशतसे घट्के १.७२ प्रतिशतमे आइल बा । इहो विदेशमे गइल नेपाली नागरिकके जोडके आवेवाला सङ्ख्याके सामेली प्रतिशत ह बाकि तथ्याड्ढ विभागद्धारा वास्तविक जनसङ्ख्या वृद्धिदर त १.३५ प्रतिशत देखवले बा ।
नेपालके जनगणनामे पूर्व मेचीसे पश्चिम महाकालीतक हिमाल, पहाड आ तराई हरेक गाव वस्ती, टोल तथा सहर मे वसोवास कर रहल प्रत्येक व्यक्तिके नाम, जात, उमेर, लिड्ड, जातजाति, भाषा, धर्म, शिक्षा, वैवाहिक स्थिति, पेशा व्यवसाय उत्तर दाताके अनुसार हि तथ्याड्ढ संकलन करलजाला । इहे तथ्याड्ढके आधारमे देशमे र्आार्थक सामाजिक, राजनीतिक तथा भौतिक विकास खातिर उपयुक्त नीति तथा कार्यक्रम तर्जुमा करेमे सरल होखेवाला होलासे सम्पूर्ण विवरण तयार करके केन्द्रीय तथ्याड्ढ विभागद्धारा इ प्रतिवेदन सार्वजनिक कइल गइल ह । साक्षरताके अवस्था समग्ररूपमे २०५८ सालमे ५४.१ प्रतिशत रहे जउन उक्त तथ्याड्ढ ५४.१ से बढके ६५.९ प्रतिशत पहुचल बा, जेमे महिलाके साक्षरता सापेक्षितरूपमे बढलाके वावजुद पुरुषके तुलनामे कमे बा । विज्ञलोगके अनुसार प्रत्येक चार घर परिवार मे एक जना पुरूष वैदेशिक रोजगार मे संलग्न रहल बा । जेकर कारण कुल जनसङ्ख्यामे महिलाके जनसङ्ख्या जादा आ पुरूषके जनसङ्ख्या कम लउकल बा । समग्र महिलालोगके सङ्ख्यात्मक रूपमे वृद्धि भइलाके वावजुद भि गुणात्मक रूपमे वृद्धि होखे नइखे सकल । महिलालोगके धर्म, संस्कार, परम्परा, अन्धविश्वास, रूढिवाद अभियो तक छोडले नइखे काहेकि एकओर शिक्षा आ चेतना हि नइखे त दोसरओरी पितृ सत्तात्मक सोच भइल हमनीके समाज महिलाके दबावत आइल बा । खराब अन्धविश्वास, रूढीवादी, कुरीति, महिलालोग पर होखेवाला सब किसिमके हत्या हिंसाके अन्त्य कर सकलजाई तबे मात्र महिलाके अवस्थामे सुधार सायद आइत ∕ दिनानुदिन सञ्चार माध्यममे आरहल दुःखद् समाचार पढ्लापर लागेला, महिलाके अवस्थामे सुधार का आई उल्टे बेटी खालि जनमवली कहके अपने पतिद्धारा पिटाएके अवस्था अभियो विद्यमाने बा । बेटा होखो चाहे बेटी आपन सन्तानके जन्म देवेखातिर मृत्युसे सङ्घर्ष कर रहल उ महिलाके बेटी खालि जनमवलीस कहके अपने पतिसे पिटाइ खाएके परि त उ महिलाके घरेसे घरेलु हिंसा सुरु होला । का अब हिंसा रोकेखातिर घरे से सुरु करेके नापरि ? ओहितरे अपने निर्णयमे बाचेके अधिकार भि महिलालोगके मिलल नइखे । एगो महिलाके बाचेके अधिकार उपर मानव अधिकार हनन होरहल बा । महिलाद्धारा सहते आवल हिंसा आजुसे नाह । इतिहास देखलजाव, पहिलेके सती प्रथाअनुसार पतिके मरलाके बाद पत्नीके जिउते चितापर जलेवाला अवस्था रहे । ‘हमर बालबच्चा छोट बा, हम अभि काहे सती जाई ∕’ कहके सती जाएके नामनलापर घिसियावत लेगइलापर डेराके भागेके खोजलापर लास सदगत करे गइललोग इटा पत्थरसे मारके विभत्स हत्या करके पतीके लाशपर लियाके जरावेखातिर राखलजात रहे जइसन बात अभि सुनलापर देह कापेला । बाकि आजकाल महिलाके विवाहमे दहेज नालियइला खातिर जिउते जलेके पडे, डाइनके बकवास आरोप सहेके पडे, घर परिवार मे अपने पतिद्धारा होखेवाला हिंसा, समाजके डर, मा बापके ईज्जत जोगाके हम अपने सहेम कहलेसे महिलाके थप हिंसा सहेके पडता ।
एहतरे मुलुक २१ औँशताब्दीके दुसरका दशकमे अइलाके वावजुद भि इ अवस्था आवता त महिलाके आउर केतना हिंसा सहेके पडि ? एकतरफ त अइसन घटना घटिये रहलबा त, दुसरा तरफ सुदूर पश्चिमओरी रजस्वला भइलापर घरसे वाहर अलग बइठेके पडेला जेकरा छाउपडी प्रथा कहलजाला ओइसन समयमे कहियो बलात्कृत होखेके, कहियो सापके डसला से मरेके अवस्था महिलालोगके बढलहि बा । दे उता खिसियालन, आग लागेला, घर मे बाघ आवेला जइसन बकवास कुतर्क अगाडि कके महिलाके छाउपडी प्रथा स्वीकार करेके बाध्य कइलाके वावजुद भि राज्य कुछो करेके नासकेवाला अवस्थामे पुगल अत्यन्त दुखद बात ह । मध्यपश्चिममे हैजासे मरल सरह त महिलाके जान छाउपडीके कारण जारहल बा आ राज्यके अन्य भू–भागमे महिलाबिरुद्ध होखेवाला कुरीति आ कुसंस्कार धार्मिक चाहे संस्कार जन्य बाध्यता के अगाडि बढावल जाय त महिलाके केतना ज्यादती सहेके पडेला बयान करके साध्य नइखे । प्रत्येक दिन महिला हिंसाके समाचार समावेश नाभइल सञ्चार माध्यमे नइखे । नेपाली समाजमे व्याप्त खराब चिजके खतम नाकइलजाए त महिलाउपर हत्या हिंसा दिनानुदिन बढ्ते जाई आ राज्यके बडका हिस्सामे रहल जनसङ्ख्याके मानमर्दन होई । का अइसने विभत्स आ दर्दनाक बातसे ई राज्यमे महिलाके संख्या अकस्मात बढल ह ओहिसे सङ्ख्या कम करेखातिर राज्य मौन त ना भइल बा? अगर नाह त, आधासे ज्यादा रहल महिलाके सम्मान, पहिचान आ संरक्षण काहे नइखे करेसकत? महिलाउपर हो रहल हिंसा अन्त्य करेखातिर राज्य काहे कानमे तेल डालके बइठल बा? आ राज्यद्धारा महिला हिंसा अन्त्य करेखातिर जेतनो नारा लगइलो पर महिलाउपर होखेवाला घरेलु से लेके अन्य प्रकृतिके हिंसाके अन्त्य करेवाला अभियान चलउलो पर आ अउर अन्तर्राष्ट्रिय अभियानमे ऐक्यबद्धता जनउलापर भि महिला विभेदीकरण आ हिंसा कहि नारामे मात्र सीमित त नाहोई?
मझेरीमा पहिलो पटक प्रकाशित – 2013-01-04 18:33:29 +0900

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