बुढेसक थेघ (मैथिली कथा)

वृद्धाश्रम आ अनाथ आश्रमक चर्च छोटेसँ गप्पक क्रममे सुनैत छलहुँ । उमेरकसँग मोनमे एकटा उत्कण्ठा होइत रहल ओही ठाम जाकऽ ओतुका वास्तविक स्थिति देखवाक ।

आखिर अपना लोकसँ तिरस्कृत व्यक्तिकेँ ओही ठाम केहन अवस्थाक सामना करए पड़ैत छन्ही ।

आखिर एक दिन फुर्सतक समय निकालि पतिकसँग जा पहुँचलहुँ एकटा वृद्धाश्रम । एही पुन्यकाज करएवला संस्थामे किछु अपनो योगदान कए पुन्यक भागि बनबाक सेहो मनसाय लऽ कऽ गेल रही । मुख्य द्वार खुजलाक वाद परिसरक भितर जतए ततए बृद्ध महिला आ पुरुषक दर्शन भेल सब किछु ने किछु काजमे लागल । कियो पूर्ण प्रसन्न तऽ किओ निर्विकार आ कियो अत्यधिक उदास आ अपनहिँसँ जेना खिन्न । ई दृश्य कोनो असामान्य नही लागल कियाक तऽ अपन खुनक सम्बन्धिसँ अबहेलित अपरिचितक बीच नव सम्बन्ध कायम केनाइ बुढ़ेस कालमे सुखद नहिये भऽ सकैत छैक । मानस पटल पर कतेक रंगक विचार अबैत जाइत रहल कतेक प्रश्न उठैत रहल आ उत्तरक खोज मोन करैत रहल । तावत एकाएक एकटा बुद्धा जे ओसार पर तरकारी कटैत छलीह, तिनका पर नजरि पड़ल हम जेना संज्ञा शून्य भऽ गुलहुँ ।

ओही महिलोक नजरि हमरा पर पड़लन्ही । झट दए हाँसु आ तरकारिक वासन लए भितर मकान दिस चलि गेलीह । हम पतिकें कहलयियनि – यौ ! ओसार पर जे महिला तरकारी कटैत छलीह तिनका देखलियनि । ओ तऽ अनमन बड़की काकी जकाँ लगैत छलीह । पति खिसिया गेलाह आ कहलनि – रहलुहँ पढ़ियो लिखियोकेँ स्त्रीक स्त्रीए । कहुँ तऽ ओ एतए किएक यतिह । ओ तऽ रमन भाय लग छथि पटनामे ।

हमरा जेना मोन नही मानलक । कहलअिनि – यौ विना नौओं के एक रंगक मुँह, कान, कथा पिहानी आ सिनेमामे देखलिएक ऐना साक्षातमे नही । हम एते धोखा कोना खायब । आखिर ओ बृद्धा हमरा देखि ओतएसँ उठि किएक गेलीह ? कने पता करियौ ने ?

हमर नारी सुलभ हठक आगाँ पतिकें मानए पड़लन्ही । ओ ओतुका आफीसमे जा कऽ आग्रह कएलखिन्ह जे कने अहिठाँ रहनिहार बृद्धासभसँ भेट करबा दिअ, कने काल हुनकासभसँग समय बितेबा लेल चाहैत छी आ किछु सनेस जे हुनकालोकनिक लेल अनने छी, सेहो अपनही हाथें देवाक इच्छा अछि । मनेजर निक लोक छलाह । ओ हमर पति ओतुका जानल मानल डाक्टर भेलाक कारणें नामसँ परिचितो । तएँ आग्रह मानी एकटा कारिन्दाकें पठा सभकें बाहर मैदानमे बजेलखिन्ह । हम गाडीसँ ताबत ओढ़नाबला झोरा निकालिकें आनि लेलहुँ जे देवाक लेल अनने रही आ किछु फल, मिठाइ, आदि ।

सब बृद्धबृद्धा आबि गेलीह जिनक संख्या गोट पचासेक छल । ताबत मैनेजरक नजरि पड़लन्ही जे एक गोटे कम छथि ओ कारिन्दाकें कहलखिन्ह “पंडिताइन चाची क्यों नहीं आई तवियत तो ठिक है ?” कारिन्दा कहलकन्ही “सर ओ आना नही चाहती है, तवियत बिल्कुल ठिक है” । हमर शंका विश्वासमे बदलिरहल छल । हम विचहिमे कहीं बैसुलहुँ “सर हम खास कऽ कए हुनकेसँ भेटए चाहैत छी” ।

मजेजर साहेबकेँ बुझवामे भाँगठ नहिरहलन्ही जे काकी संकोचबस नही अबै छथि । खैर जे जेना, हम सभकेंँ ओढ़ना फल, मिठाइ बाटि मनैजरकसँग काकीके कोठरीमे हुनकासँ भेटए पहुँचि गेलहुँ, हमरा पर नजरि पड़तही काकी घौना कऽ कें कानए लगलिह । हम दूनु गोटे गोड़ लगलियन्हि, लगमे जाकें बैसि हुनका चुप करेबाक प्रयास करए लगलहुँ, मुदा काकीके नोर जेना बान्ह तोड़ल धार बनी गेल छल । पुछलिएन्ही – एतए कते दिनसँ छी ? कने स्थिर भेला पर कहलन्ही – गामसँ अनलाक छओ मासक भितरे रमन एतय राखि गेलाह, जे एतए तोरा अपना उमेरक लोकसभ भेटतौक, गप्प–सप्प करएमे मोन लगतौक, एतए डेरामे ककरासँ गप्प करबें । सब अपन–अपन काजमे ब्यस्त रहैत छैक धीयापुताक सँगी साथी अबैत छैक, जगहक असोकर्ज सेहो छैक, तोहर रहन–सहनसाग सेहो कने……।

हम कहलियन्ही जे तखन गामे पर पहुँचा दएतए ।

काकी बजलहि– रमन कहलक जे ओतए एसगरे रहबें तऽ गामक लोक कि कहत हमरा आ गाम बेर–बेर जाएबो कठिन होइत छैक आ पटनासँ दिल्ली तऽ मास पन्ध्रह दिन पर आबि सकैत छी । आफिसोक काजे अबिते रहैत छी ।

एते कालधरि हमसब चुपचाप काकीके गप्प सुनैत रहलहुँ आ हुनक नोर भिजैत आँचर देखैत रहलहुँ । हमर मोन खिन्न भऽ गेल, मैनेजरसँ आग्रह केलिएन्ही जे दू–चारि दिनक लेल हमरासभसँग जाए दिअनु । हिनकर सम्बनधमे आओरो बात बादमे करब । मैनेजरसँ इहो पता लागल काकीकेँ राखिकेँ गेलाक वाद रमन भाए घुरिकेँ कहियो नही एलखिन । कहियो काल फोन कऽ हाल समाचार पुछैत रहथिन आ दू चारि मासमे किछु पाइ संस्थाकेँ पठा देल करथिन ।

पहिने तऽ मनेजर मानवाक लेल तैआर नही होइत छल मुदा हम कललियैक जे बेटा चारि बरखमे एको बेर नही एलैक से किएक चलि एतैक एही बीचमे आ जँ एतए तऽ कहबनि जे अहाँक सम्बन्धी लग गेल छथि आ अहाँक माय अपनही जएबालेल चाहैत छलिह । हँ, जँ ओ अबैथ तऽ एक बेर फोन करब । हम नेने एबन्ही आ हमहुँ हुनकासँ भेट करबन्ही ।

अन्तत: मनेजर भलमानसाहत देखेलन्ही आ कहलन्ही जे ठिक हैले जाइए, देखा जायेगा, हम सम्भाल लेंगे । वैसे भी यहाँ छोड़कर जाने वाला कलियुगका श्रवण कुमार ही होता है अगर इतनी फिक्र करता तो यहाँ रखता ही क्यों ?

हमसब काकीकेँ लऽ केँ बिदा भए गेलहुँ । गाड़ी चलिरहल छल ओ सँगही हमरा मानस पटल पर किछु पुरान गप्प सेहो सिनेमाक रिल जेना चलिरहल छल । हमरा मोन पड़ि गेल जे हमर बाबुजी हमरा वाद दोसर सन्तान नही चाहैत छलाह । किएन तऽ अपना समयक पढ़ल लिखल आधुनिक विचारक लोक, सभदिन नोकरिक क्रममे बाहर रहथि, “कहथिन जवाहरलाल सन सम्पत्तिबला आ रुतवा बला जखन एकटा बेटीसँ सन्तुष्ट छथि तऽ हमरा किएक चाहिं बेटा, कोन जमिन्दारी अछि जकर वारिस चाहिं आ जँ चाहबे करी तऽ बेटिए किएक ने बनी सकैत अछि वारिस आदि इत्यादि तर्कसँ सबकें चुप करा दैत छलथिन्ह । मुदा बाबा आ दादिक हठक सोझाँ झुकै पड़लन्ही तँ शर्त रखलखिन जे एकटा सन्तान हम आओर होमए देव आब भागे कर्मे जे होय । बाबाक गोहारि भगवान तक पहुँचलनि आ हमरासँ सात बरखक छोट हमर भाएक जन्म भेलैक । मुदा बाबुजिक सोचमे परिवर्तन नही एलन्ही ओ हमरा बेटासँ कम कहयिो नही बुझलनि । हमरो हाँस्टलमे राखि एम.ए. करौलन्ही । जावत हमर भायक जन्म नही भेल छलैक काकी हमरा मायकेँ कखनो बौसिकेँ पिआबै लगथिन जीवन घुटी “कनियाँ बेटिएसँ राज लगितैक तऽ लोक किएक मरितैक बेटा लेल । बेटा बुढ़ेसक थेघ छी, बेटी तऽ पर घर होइत छैक । बिना बेटाक पिण्डदान केने कि मोक्ष भेटैत छैक, आदि इत्यादि, आ माय हुनका सब गप्पक जबाब हुनका मोनक विपरित दैन्ह तऽ खौंझाकें कहथिन – हे जे मोन होइए से करु मुदा भोरे भोर अपन मुँह नइँ देखाएल करु । बाँझसँ बेसी खराब काग बन्झा होइत छैक, माय हँसिकें कहन्ही बहिन काग बन्झा तऽ ओ होइत छैक जकरा दोसर सन्तान नही होइत छैक मुदा हम तऽ हेबए नही दैत छिऐक तऽ हम कोना भेलहुँ काग बन्झा ।

हमरा भाएक जन्मक वाद काकिक ओसब शिकायत दूर भऽ गेलन्ही मुदा हमर होस्टलमे रही पढ़ब लिखबसँ तैयो गप्पक मसला भेटल रहलन्ही । मुदा काकिक कोन दोष छलन्ही । ओ जही परिवारक छलीह ताही अनुप सोचब सामान्ये छल । हमर माय बाबुजी बेटा तपन लग सेहो रहथि आ हमरोसभ लग रहैथ बढ्ड अरामसँ समय बितिरहल छलन्ही । देखाउँसे वा लोक लाजे रमन भाए सेहो काकीकें लऽ गेलखिन्ह अपना लग आ तकर विद्रुप अवस्था हमरा सभक समक्ष अछि । हमर पितियौत बहिन अर्थात काकिक दूटा बेटीसभ नही तऽ अपना पढ़ल लिखल छल आ ने कोनो नोकरिहारासँ विआहल गेल छल, दूनु बहिन साधारण गृहस्थक परिवारमे छल । ओतए मायकें लऽ जएबाक साहसो नही केलक समाजक नकहानिक डरे आ कखनो करैत तऽ काकी भरिसक जेबो नही करितथि । बेटिक ओतए जएबामे प्रतिष्ठाक प्रश्न छलन्ही । कक्का जावत जीवैत छलाह दूनु प्राणी गाममे एक दोसरक थेघ बनल रहलाक । मरएसँ पहिने बेटाक हाथमे काकिक हाथ दए अपना जानैत निश्चिंन्तसँ मरल छलाह, मुदा ओ नही जनैत छलाह जे बुढ़ेसक थेघुआ लाठी अण्डिक छैन्ह सखुआ बुझबाक भ्रम लेने मरलाह ।

गाड़िक ब्रेक लगैत हमरा मोनमे चलएबला चलचित्रके रिल जेना सठि गेल । गाड़िक फाटक खोली काकीकें बाहर केलियन्ही । घरक भितरमे हमर माय जे संयोगसँ एतही छलीह हुनका पर नजरि पड़ैत देरि घार पकड़िकें जे कानए लगलीह तऽ घरक वातावरण पुरा जेना किछु कालक लेल भारी भऽ गेल । हमरा माए अचम्भित छलीह काकीकेँ देखिकें । जे घुमए लेल गेल रही हमसभ तऽ काकी कतए भेटि गेलिह । बादमे सभटा गप्प बुझलाक वाद माय जेना बौक भए गेलिह हुनका जेना विश्वास नही होन्ही घटना क्रम पर । किछु काल मायक मन:स्थिति ठकि करवामे लागि गेल ।

मायक मन:स्थिति तऽ सिथर करवामे सफल भेलहुँ मुदा अपना मोनमे जे असुरक्षा भावना धरए लागल मुदा फेर अपनहिँ अपना मोनकेँ बुझेलहुँ जे एकटा बेटियो अछि आ सबसँ बेसि लिखलकें मेटि सकैत अछि ।

दोसर दिन एक लाखक चेक लऽ बृद्धाश्रमकबाट धेलहुँ जे ने जानि कते बड़की काकी छथि अबहेलित परिजनसँ । बेटा नही ई बृद्धाश्रम छी थेघ बुढ़ेसकाल, ओकर बलगर होयब बेसी आवश्यक लागल । दोसर दिन अनाथ आश्रमक दृश्य सेहो देखि एलहुँ आ लागल जे मन्दिरमे लोक पूजा करबालेल जाइत अछि, मुदा असलमे पूजाक स्थान तऽ ई सब छी चढौआ चढेवाक स्थान तऽ ई छी, भगवान तऽ एतही हेता ओतए मन्दिरमे तऽ मात्र हुनकर मूर्ति अछि । ओ तऽ बुढ़क लाठी आ बच्चाक रखवार बनल एतही भेटि सकैत छथि । आब हमर जीवनक उद्देश्य जेना बनी गेल अछि ओही दूनु ठामक भ्रमण आ यथासाध्य सहयोग । काकीकेँ पुन: नही पठेबाक लेल हृदयसँ संकल्प कएलहुँ । देखल जेतैक । पहिने आबथु तऽ रमन भाय । एक बेर, तखन फरिया लेब आश्रम आ जा, जरुरी खानापूर्ति कऽ देलिएक आ लागि गेलहुँ एही यज्ञक एकटा कठिन रूपमे ।

(मैथिली कथाको नेपाली भावानुवाद : लेखिकाले स्वयं आफूलाई पात्र बनाएर बृद्धाश्रमलाई भगवानको मन्दिरभन्दा ठूलौ स्थान मानेको भाव मुख्य रुपमा यस कथामा दर्शाउनु भएको छ । लेखिका एकदिन बृद्धाश्रममा जान्छिन, जहाँ उसको आफ्नै परिवारको काकी भन्ने नातामा पर्ने एक जना भेटाउँछिन् । उसको छोराले उनलाई त्यहाँ छाडी दिएको र समय समयमा केही पैसा पठाइ दिएको बाहेक खोज खबर गर्दैन । लेखिका र उसका पति काकीको दशामा दु:खी हुन्छन् र बृद्धाश्रमका मैनेजरसँग अनुमति लिएर आफ्नो घर लग्छन् । घरमा लेखिकाकी आमा पनि हुन्छिन्, जो काकीलाई हेरेर दु:खी हुन्छिन् ।

लेखिका भगवानको मन्दिरमा भगवानको मूत्र्तिरहे पनि पूजा गर्ने । केही दक्षिणा चढाउने, केही दान दिने स्थान र भगवानको असल वासस्थान बृद्धाश्रम भएको निष्कर्षमा पुगेर एक लाखको चेक बृद्धाश्रममा दान दिन्छिन् र छोरालाई बुढेसकालको थेघ (सहारा) नमानेर बृद्धाश्रमलाई नै सहारा मान्छिन् र यस स्थानलाई समृद्ध बनाउनु पर्ने सन्देश दिन्छिन् ।)

– पूनम ठाकुर
राजविराज– ६ मैथिल टोल

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2 thoughts on “बुढेसक थेघ (मैथिली कथा)”

  1. होम सुवेदी

    खुसी लाग्यो पढेर । चित्त बुझ्यो । बुढेस कालको कुरा सबैतिर उही हुने । वृद्धाश्रमको वास अब सबै बुढाबुढीका हुने भए ।
    मैले भने अब मझेरीबाट रचना पोेस्ट गर्ने मेलो नपाएने भएँ । यसैले अब पाठक मात्र हुने भएँ । सुरुदेखि नै यससँग सम्बद्ध भइयाे यसैले यसकाे माया लाग्छ । एक साधारण कमेन्ट लेख्ता पनि इमेल मागेपछि हैरानी हुने रहेछ ।

    1. सर, कम्प्युटर बटमार्फत दिनमै शयौं अनावश्यक कमेन्ट आउने भएर त्यसो गरिएको हो । र, एकपटक सफलपूर्वक पोस्ट गरिसकेपछि त्यो आवश्यकता पनि नहुन छोड्न पर्ने हो ।

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