Skip to content

मैथिली साहित्यमे ‘भगजोगनी’क आगमन

  • by


वास्तवमे असल साहित्य मस्तिष्कके मसी सँ नहि लिखल जाइत अछि, हृदयके मसी सँ लिखल जाइत अछि । हृदयमे मसि सञ्चित करैल पैघ, त्याग आ तपस्या चाही । लिखव कहिक नहि लिखाइबला आ नहि लिखब कहियौ क कतौ न कतौ सँ प्रष्फुटित होइबला चिज थिक- साहित्य । साहित्यसाधक जेजेहेन जीवन भोगने अछि, जे चिजमे अपना भिजल अछि आ जे सँ अपनके छुवाएल अछि, ओकरे हुबहु लिपीवद्ध करैत अछि । एना करैत काल कतौ अपने आपके चरम आनन्दमे पहुचेलाह बात आवसकेत अछि । कतौ नहि निक सँ बिझायल बातसभ व्यक्त होब सकैत अछि । साधक स्रष्टा मात्रे नहि भक जीवन आ जगत्के द्रष्टा सेहो होब जायत अछि । तहिना अपन भोगल युगीन पीडा, छटपटी, बेचैनी, सङ्गति-असङ्गति, आशलागैत समय आ निरस अवस्था सभक प्रतिनिधित्व करैत उदाएल एक सशक्त नारी हस्ताक्षर थिक- करुणा झा । हुनक २०६८ सालमे ‘भगजोगनी’ शीर्षकके मैथिली कविता सङ्ग्रह साझा प्रकाशन, ललितपुर सँ प्रकाशन भेल अछि । ई लेखमे ओही कवयित्री झा आ सद्य कृति ‘भगजोगनी’क वारेमे सामान्य चर्चा करैके ध्येय राखल गेल अछि ।

कवयित्री झाक कविता सिर्जनाके भावभूमि कहिके मतलब वर्तमान युगके चरम विसङ्गति, अतृप्ति, छटपटी आ किंकर्तव्यविमूढता थिक । हुनक अधिकांश कविता सँ वर्तमान उठेने अछि, विगतके फटकारने अछि आ भविष्यके खबरदारी करने अछि । मानव भूत सँ पाठ सिक्ते एवम् समुनन्त भविष्य बनाबैके आशावादी सोचक साथ वर्तमान समयके भरमग्धुर उपभोग कर परत । हुनक बहुतोे कविता याह कहैत अछि । ओ हावामे महल नहि ठार करैत छथि । खुख आदर्शके पाछु नहि दौडै छथि । मुदा, समाजक कुरूप पक्षसभके सर्वाङ्ग नग्न बनाबैल समेत नहि छोडैत छथि । हुनक कवितामे कोमल, करुण आ हृदयस्पर्शी भाव सेहो आयल अछि । विद्रोही, बेहतरिन आ मनमस्तिष्कमे आँधीबिहारि आनैबाला क्रान्तिकारी स्वरसभ सेहो परैत अछि । कतौ काँच शैली अछि, कतौ पाकल शैली अछि । मुदा, लयप्रधान भ’क हुनक कविता सप्तकोशी बहल जकाँँ खडखडाक बहिरहल अछि । कवितामे शब्दसंयोजन करैत काल किछु हिन्दी आ एकाध अङ्ग्रेजी भाषामे प्रयुक्त शब्दसभ पडल अछि । ओसभ कविताके मूल्य आ मैथिली भाषाके कोमल मर्मके ओतेक बेसी स्खलन नहि केने अछि । जनजिह्बमे सहजे बसैबला शब्दसभके मात्रे मैथिलीकरण गरैक कारण सँ कवितासभ युवापिँढीक लेल पठनीय आ श्रवणीय लागैत अछि ।

‘भगजोगनी’ कविता सङ्ग्रहमे जम्मा ३८ वटा कवितासभ अछि । ‘सरस्वती बन्दना’ सँ सुरु भ’क ‘सहिद-सलाम’ तक पहुचेला पर ‘भगजोगनी’के काम पूर्ण भेल अछि । ई कृतिके आगुपाछु ध्यान देला पर भेटल गेल कवयित्री झाक कवितागत प्रवृतिसभके देहायबमोजिम अङ्कित करल जा सकैत अछि ।

१. आध्यात्मिक एवं दार्शनिक दृष्टिकोण- हिन्दू धर्मावलम्बीसभ सरस्वतीके विद्याक अधिष्ठात्री ठानैत अछि । हुनक आराधना सँ ज्ञान, विवेक आ प्रज्ञाके चक्षु खुलैके बात बताबै अछि । आराधनापश्चात् कैल गेल शैक्षिक कार्य सफल होबाक मान्यता राखैत अछि । तकरे प्रभाव सँ भ’ सकैत छे, ‘भगजोगनी’ कविता सङ्ग्रहके पहिल कविता ‘सरस्वती वन्दना’ राखल गेल अछि । अन्हार नाश क’क इजोर करैल बरदान मागैत कवितामे कहल गेल अछि-

शारदे ज्योतिर्मयी माँ
ज्योतिके बरदान दिअ
अज्ञान तम के दूरी क’ माँ
ज्ञानपूँज प्रकाश भरि दिअ । (पृ.१)

तहिना संसार निर्दयी अछि, एत सबकिछो सर्वस्वीकार्य भावक साथ जिबैल प्रयत्न करपरैत अछि । जन्मक लेल सेहो आ मृत्युक लेल सेहो मानव स्वतन्त्र नहि अछि । मुत्यु चाहला पर सेहो स्वीकार नहि करल जा सकैछे, जन्म बदलब कहिक भी सम्भव नहि होइछे । जेहेने छै, तेहेनै स्वीकार्य भाव सँ आत्मसात् करैके विकल्प नहि रहल दार्शनिक दृष्टिकोण व्यक्त करैल समेत कवितासभ पाछु नहि अछि । ई कोटिमे ‘सपना’ आ ‘फेर आबू कन्हैया’ जकाँ कवितासभ परैत अछि ।

२. मातृभूमिप्रतिक अगाध प्रेम- मातृभूमिप्रति सरोकार नहि राखैबला केहो नहि होइछे । गुणक बेवास्था करिक कृतघ्न भेनाइ घोर अपराध कर्म थिक । विशाल छाती बनाक सोच्ला पर आकाश चार (छत) थिक, पृथ्वी मातृभूमि थिक । ओ विशालतामे हामसभ हरा सकैत छी । अपन मौलिक पहिचानके ओझेल क सकैत छी । ताही हेतु जन्मभूमि आ कर्मभूमिके सेवामे जीवन समर्पित करसकला पर अपनासभ धन्य मात्रे नहि हेबै, मौलिक अस्तित्वसहित गर्वक साथ शिर उच्च पारैल सकैत छी । याह आ एहेने चेतना कवयित्री झाक कवितामे सेहो प्रशस्त भेटल जा सकैत अछि । ओ मिथिलाके महिमागान गाबैल सेहो पाछु नहि परल छथि । अपन आस्था, विश्वास आ सर्वस्व मातृभूमि मिथिलाके लेल समर्पण करल खुलासा करैल नहि चुकल छथि । ई कोटिमे ‘मातृभूमि मिथिला’, ‘हमर मिथिला’ जकाँ कवितासभ परल अछि ।

अपन चरणके अमृत सँ
सदा शान्ति बरसाबै
कोशी कमला बहै जयत
निर्मल प्रेम सुधा दर्शाबै । (पृ. ७)

३. नारीवादी चेतनाके प्रष्फुटन- कहल जाइत अछि, कलाकार/साहित्यकारके लिङ्ग नहि होइत अछि, तोकल भूगोल नहि होइत अछि । ओकरोसभके जगत् अथाह होइत अछि, जकरा कियो नाप चाहलो पर नापि नहि सकैत अछि, जोख चाहलो पर जोख नहि सकैत अछि । ओहोमे कवि/कवयित्रीसभके विचरणभूमि नितान्त फरक ढङ्गके अलौकिक किसिमक होइत अछि । मुदा, सदिखन कवि भ’क आ कलाकारे गनाक केहो नहि रहैल सकैत अछि । व्यवहारिक जीवन व्यतितमे नहि लागि’क सुख नहि होइत अछि । जीवनभोगाइक तीतमीठ क्षणसभ सँ साहित्य सिर्जनामे मद्दत पहुचैत अछि । कवयित्री झा नेपालीय मधेसी जनजीवनभित्रक नारी प्रतिभा भेल कारणे सँ ओ अपन भोगल सामाजिक जीवनक कठोर पक्षसभके कवितात्मक आकार दैला नहि चुकल छथि । नारी चार दिवार भित्रर जकरल रहल पुरुषक अहङ्कारके खेलौना नहि थिक, सृष्टिक अपार शक्ति थिक से आशय भेटैत अछि । ओ नारीके सन्तानोत्पादनके यन्त्र आ मनोरञ्जनके खेलौना ठाननिहार प्रवृतिप्रति रोष व्यक्त करैत सुतल नारीके जगाबैके प्रण करैत छथि-

हमरा अहसास भ’ चुकल अछि
हम एकैसम सदी के नारी छी
जागि चुकल छी हम आ जगायब हम सबके
अइ क्रान्तिकें जनजन तक पहुचायब
सब सुतल नारी चेतनाकें हम जगायव । (पृ.७)

४. विद्रोही आवाजके उच्च स्थान- समाजक नहि मिलल पक्षसभके मिलाबैल साहित्यकार/बुद्धिजीवीसभक मसि खर्च हेबाक चाहि, आवाज गनगनाबक चाही । अग्रगामी कदमके पृष्ठपोषण करबाक चाही, पश्चगामी आ यथास्थितिवादी सोच एवं क्रियाकलापके धरासायी बनाबक चाही । एह मान्यता बमोजिम कवयित्री झा सेहो अपन कलमके सान चढाब तत्पर आ सक्रिय रहल देखल जाइत अछि । इजोर दिनके चाहना आ समाजके अग्रगतिके कामनामे हुनक शब्दसभ खर्च भेल अछि । ई कोटीमे ‘हमर की दोष ?’, ‘आतङ्कवाद’, ‘प्रजातन्त्र’, ‘संसार’, ‘द्रोणाचार्य’ आ ‘लोकतन्त्र के चारिम स्तम्भ’ जकाँ शीर्षकक कवितासभ परल अछि ।

नेता सब साँप बनल
जनता बनल छिपकली
सत्ता के भूख विकट
नइ आदि अछि, नई अंत
राजा गेल, रानी गेल
आब अछि प्रजातन्त्र । (पृ.२१)

अहिना अत्याचार आ अन्याय जम्मा भेल गेला पर, पत्रकारिता जगत् खम्बा बनिक पाखण्डीसभक शिर पर बज्रत से उद्घोष करैल पाछु नहि छथि ।

यदि ई हिस्सा रुकल त
लोकतन्त्र के ई चारिम खंभा
अहि के उपर खसि पडत
हम त लोकतन्त्रके चारिम स्तम्भ छि । (पृ.५२)

५. दिगो मित्रता, शान्ति आ सौहार्दताके कामना- एखन देश आ जनताके निमन आ अपन संविधान चाही । साथसाथै दिगो शान्ति, सद्भाव आ सौहार्दता चाही । सभ नेपाली नेपालभित्रे अटसकैबला संस्कार, रीतिथिति आ व्यवहार चाही । राज्यक हरेक तह आ तप्का तथा संयन्त्रसभमे सभ वर्ग आ सम्प्रदायक मानवसभ पुगैबला नीति आ कानुन चाही । एही सँ बढकर निर्मित आ पारित समझदारी आ कानुन कार्यान्वयनके लेल सचेत आ सक्रिय रहैला परैत अछि । अही सन्दर्भके टिपनटापन करैत कवयित्री झा कवितात्मक रूप दैला चाहैत छथि-

बनू कर्मरथी, कर्म क रथ पर चढि
चलू मंजिल दिस, शुभपथ पर बढि
धरती उगैल चाहे कताबे अंगारा
चाहे नभ बरसाबै मूसलधारा । (पृ. ४५)

६. प्रकृतिके सजीव चित्रणमे पोख्त- प्रकृति अपनसभके जीवनदान मात्रे नहि देने अछि, जीवन जिबैके कला सेहो सिखेने अछि । प्रकृतिजँका अटल भ’क अविरल यात्रामे निकलैल नहि सकल जाइत अछि । प्रकृतिके हुबहु अनुकरण क’क आदर्शमय धरोहर खडा करैल सेहो नहि सकल जाइत अछि । मुदा, प्रकृतिके लीलाप्रति मख्ख आ मस्त होब सकल जाइत अछि । कवयित्री झा सेहो प्राकृतिक सौन्दर्यता आ सुवासमे धन्य भेल बात बखान करैल पाछु नहि परल छथि ।

अलसायल यौवन जकाँ
भोरक रौद भेल
फूलक बोझक नीचा
खुशबु लचकि गेल । (पृ. ११)

७. पुर्खा एवं सहिदसभक त्यागके उच्च मूल्याङ्कन- गुणीके कदर करनाइ, असहाय अशक्तके मद्दत पुरेनाइ मानवीय धर्म थिक । आओर, पुर्खासभक त्याग आ सहिदसभक बलिदानीके अमर गाथा सँ सौभाग्यशाली नहि होनाइ कृतघ्न थिक । सच्चा मानव होबाक अछि त वीरपुर्खाक अमरगाथाके बखान करपरैत अछि । पुर्खा आ सहिदसभके सपना, जपना आ कामनाके मूर्तरूप दैला कटिबद्ध भ’क लगबाक चाही । कवयित्री झामे यही किसिमक सोचके विकास भेल देखल जाइत अछि । ओ ‘देशक वीर’ आ ‘सहिद-सलाम’ शीर्षकक कवितामे सहिद आ पुर्खासभके महिमागान गेने छथि । हुनकसभक सपना अपनासभके लतिएला पर निर्दाेष नोर सरापत, से कहने छथि । देशके दुर्गतिप्रति पैघ चिन्ता व्यक्त करने छथि ।

अहाँक शहादत के परन्तु, मोल कियो चुका सकत
अधर्म आ आतंक मिलि, अहाँके सब बिसरि चुकल
अहाँ सबहक बलिदानक नाम
ई सब केलनि बदनाम । (पृ. ५५)

ओ नेपालीय मधेसी भ’क गर्वबोध करैत छथि । मुलुकके दिकत आ दुःख परल काल आगु बैढक प्राणक प्रवाह नहि राखि देश आ जनताके हक आ अधिकारक लेल लडनिहार वीरपुर्खाके वीरताके बखान करैत कविता कहैत अछि-

जखन, जखन आयल मुसिवत
मुस्किलमें पडल प्रदेश
प्राण के क गेला ओ अर्पण
बचाबै लेल अपन मधेश । (पृ. २२)

८. वर्तमान झल्काबैबला आ थर्काबैबला आवाज बुलन्द- बौद्धिक वर्ग चेतनाक संवाहक आ युग परिवर्तनक नायक थिक । सडकमे चिच्याक आ हावादारी गफ छाटिक कतौ जनचेतना नहि जागैत अछि । जखनतक समाजक बेथितिसभ, थितिमे परिणत नहि होयत तखनतक परिवर्तनके ढोलक बजैनाइ, असारक बेङ टरटरायल जकाँ सार्थकहीन होएत । अतः वर्तमान झल्काबैबला आ थर्काबैबला आवाज बुलन्द भेनाइ जरुरी अछि । मौनतामे समर्थन मात्रे नहि होइत अछि, विमति सेहो झल्क सकैत अछि । बौद्धिक क्रान्ति करैके पक्ष आ रास्तासभ फरक-फरक होइत अछि । एहेने भावभूमिमे ‘मौन समर्पण’, ‘अभिलाषा’, ‘नव निर्माण क आधार’, ‘समय नहि अछि’ जकाँ कविता ई सङ्ग्रहमे परैत अछि ।

विषधर जकाँ जखन डसत राति
अन्हरिया अहाँ कें क’ देत घाइत
हम बनि समायब उरमें चंदन
क’ रहल छी हम मौन समर्पण । (पृ. १०)

ई युगक मानवके व्यवहारिक कामकाज करैल आ भूमिक निर्वाह करैल समय नहि अछि । मुदा, इमेल-इन्टरनेट सँ बातचित करैल, राति बेरतक समय देबा सकबाक वास्तविकता उगल समेत ओ पाछु नहि छथि ।

लेकिन हमरा पूरा समय अछि
राति देर तक कम्प्युटर पर बैसबाके
नेट पर चैट करबा के समय अइ
फेसबुक के फेस सँ दोस्ती करबा के समय अछि
मेल आ फिमेल सँ
इमेल सँ विवाह करबाक समय अछि ।
एक दिन समय स्वयं आबि क’
पुछत हमरा अहाँ सँ
अहाँ समय के की केलउ
अहाँ के की भेटल ?
नइ जिलउ, नइ दोसर के जिबै देलउ
नइ हंसलउ नइ हंसेलउ
नइ जीवनमे ककरो नोर पोछलउ
जीवन समाप्त भ जायत तइयो
कहब समय नहि अछि, सब कियो । (पृ. ३९)

आ, अन्त्यमे,

‘भगजोगनी’ शब्दके नेपाली अर्थ ‘जूनकीरी’ होइत अछि । निष्पट्ट अन्हारके चिरैत अपन शरीरमे रहल छोट इजोतक भिलिकमिलिकमे दिनचर्या विताबैबला भगजोगनी अन्हार नाश क’क इजोर आह्वान् करैबला जीव विशेष थिक । ओकरामे जेहेन विशेष गुण ककरो आओर प्राणीमे नहि होइ छै । एततक कि भगजोगनी मर्ला पर सेहो इजोत देबाक काज बन्द नहि करैत अछि । विशेषतः कवितामे लय होबाक चाही, अन्त्यानुप्रासयुक्त रहबाक चाही । ई दुनु गुण ‘भगजोगनी’मे सशक्तरूपमे देखा परैत अछि । ताही हेतु हुनक कविता गद्य भेलो पर पद्यजेहेन लागैत अछि । मुदा, कवितामे कोनो शास्त्रीय विधिविधानके अवलम्बन करल नहि अछि । कवितासभ वाचनक दृष्टि सँ उत्कृष्ट अछि । शुद्ध मैथिली भाषाके आत्मसात् करैत आगु बढैल कवयित्रीके आओर प्रयास करैल पडत । हिन्दी आ अङ्ग्रेजी भाषाक जनजिह्बमे रहल शब्दसभक बाहुल्यता सँ मैथिली भाषाके गरिमामय मधुर आ करुण परम्पराक भार उठाब सकबामे प्रश्न चिन्ह लाग सकैत अछि । मैथिली भाषामे गालीगलौजो केला पर भि ओहीमे मधुरता आ कारुणिकता झलकैत अछि । एकर कारण ई भाषामे प्रयोग होइबला कोमल शब्दसभक करामत थिक । एहि कारणे ‘भगजोगनी’ कविता सङ्ग्रहमे भाषागत किछु कमजोरी होइतोमे विचारगत दृष्टि सँ परिपूर्ण आ परिपुष्ट अवस्था वोध होइत अछि । मैथिली भाषाके अपने प्रकार आ प्रकृतिके गौरवमय परम्परा भेल आ विशाल शब्दभण्डार रहबाक कारण सँ अभिव्यक्तिमे आऔर भाषाक शब्दसभ नहि ल’क नहि होइबला अवस्था कमै परैत अछि । अभावके पूर्ति करैल आओर भाषाके शब्द लाबैल पडत मुदा अभाव नहि भेला पर लाबैल अतिशयोक्ति होइबाक खतरा बढ सकैत अछि ।

कवयित्री करुणा झाक प्रयत्न सँ प्राप्त सफलतामे नेपाली नारीसभके गर्ववोध कर पडै अछि । माटिके प्रेम केनाइ, परम्परा आ संस्कृतिप्रति मोह दर्शेनाइ, युवापिँढीके मार्गनिर्देश करनाइ, लैङ्गिक असमानताक कारण सँ नारी जगत्के सामाना कर परलाहा चुनौतिसभ देखनाइ, सृष्टिके चक्र चलाबैके मात्रे नहि क्रान्तिके आगि उगिलैके सामर्थ्य नारी वर्गमे रहल आभाष देनाइ, अपनासभक समुन्नत भविष्य बनाब प्रयत्न करैल वीरसहिदसभके त्याग आदि विषयसभक विशद् चर्चा केनाइ जेहेन प्रयत्नसभ कवयित्री सँ भेल अछि । एक सचेत सर्जकके भूमिका निर्वाहमे ओ प्रयत्नशील भेल देखल जाइत अछि । नेपालीय मधेसी समाजमे नहि लिखल गेल बातसभ बहुत अछि । नहि लिखल अध्यायसभ पूरा करैके जिम्मेवारी कवयित्री झासभ जेहेन ऊर्जाशील सर्जकसभमे गेल अछि । कवयित्री झाके लेखनशक्तिमे आओर परिष्कार आबए, आओर क्रान्तिकारी विचार आ भावनासभ प्रश्रय पाबए आ समाजके लेल चेतनाके दीप बनल सफल रहए, याह शुभेच्छा सहित सफल साहित्ययात्राक लेल शुभ-कामना व्यक्त करैत छी ।

कृति – भगजोगनी
विधा – कविता
कृतिकार – करुणा झा
संस्करण – प्रथम, २०६८
मोल – रू. १२७।-
प्रकाशक – साझा प्रकाशन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *