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विध्वंस हमरा पसिन नहि

  • by
SudhaMishra

विध्वंस हमरा पसिन नहि
सृजनके हम अभिलाषी छी
प्रकृतिके सदैब सातत्य देब
अटल अठोट मोनमे लेने छी

नहि बिदा कसकैछी किनको
तिलक लगा युद्धमे लडलाय
एक जनके जनके मारलाय
ब्रह्माण्डके खण्डित करलाय
विधनाके आन अपन बनबलाय

अगर केउ सहिद होइ छै त
हमर ने सही ककरो जन्मदाता छै
कुनो कनियाँके सोरह श्रृङ्गार छै
कुनो बहिनक राखी बान्हल हाथ छै
तँ कुनो अम्बके कोखिक चिराग छै

नहि देखि सकैछी हम
ककरो घरक चार उडियाइत
ककरो चहकैत नयन ढबढबाइत
ककरो पितृक गृह डुबल जाइत
ककरो वंशक निशानी मिटजाइत

किया कि हमही एक वनिता
जनकक सुकुमारी दुहिता छी
कन्तक सुन्दर भामिनी छी
भायक दुलारी बहिनिया छी
नन्दनक सुयोग्य जननी छी

हमरा रोकबाक अछि जगमे
नव हथियार क्षेप्यास्त्र बनेनाई
शोनितक धार सँ धरती रंगनाई
अखण्ड निसर्गके विखण्डन केनाई
एकही ज्याके तोहर हमरमे बटनाई

एक माँके रोम रोममे एकही बात
सिनेहक गंगा सतत बहैत रहे
शान्तिक ध्वनि पलपल गुंजैत रहे
ज्ञानक ज्योति जगमग करैत रहे
अम्बर सँ सुधा अनुदिन झहरैत रहे

हमरा रचबाक अछि ओहन सृष्टि
जत अनुरागक एकही राज होई
राजा प्रजा एकही समान होई
एकके दर्द दोसरोके महसुस होई
दोसरके खुशीमे जत उत्सव होई

चराचरके सजैत धजैत बढब
हमही गुणी छी बलिदानी छी
हमही दानी छी अनुदानी छी
हमही रानी छी सीपकारी छी
हमही ज्ञानी छी पालनहारी छी

सुधा मिश्र
जनकपुर -४
धनुषा, नेपाल

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