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सगरो सबेर (कविता)


कत वौवाइछी बाहरमे
भण्डार भरल अछि भितरमे

सोना जवाहर हीरा मोती
कि करब लक पाँथर गोटी?
प्रेम रत्न हृदय भरल
चिन्हु अकरा खोलि नयन

राजाके राष्ट्रके छै परिधि
जकरल बान्हल बहुतो नीति
धर्ती सँ गगन छै एक देश
ताहि राज्यके अँहा नरेश

सुरुज सँ नहि राति इजोत
भोजन सँ नहि मोन विभोर
अपन ज्योति सँ सगरो सबेर
आन्नद उत्सवक रहत ढेर

सुधा मिश्र
जनकपुरधाम-४
धनुषा,नेपाल

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