जकरा भेटल बन्दुक सेहा हबलदार छै,
दोसरके अल्पज्ञानी अपनेटाके सर्वज्ञानी मानै छै,
गुण-दोषके पहिचान नई छै,
आत्मप्रशंसा गत्तर-गत्तर भरल छै,
डेग डेग सर्वेसर्वाके अभिमानी छै,
ठोप-कमण्डल बड भारी छै,
मिथिलाके दानापानीए बताह छै ।
घर-घर मर्खाहा बरद छै,
साढ बनै लेल हमेशा तयार छै,
माथ पर सिंघ नई छै,
मुदा चमेलीक तेल लगबै छै,
नाथैवाला कम छै,
तें बिन नाथल उल्का छै,
लथार फेक मातल छै,
मिथिलाके दानापानीए बताह छै ।।
प्रतिभाके कदर नई छै,
निक आन नई अपन निक छै,
कथित मानक जातिवलाके गुमाने बड छै,
दोसरके ओ अपन कहॉ बुझै छै,
चेहरा भितर एक बाहर दोसर छै,
मुहमे नई पेटमे दात छै,
मिथिलाके दानापानीए बताह छै।।।
सभकेसभ घमण्डमे चूर छै,
भाषाके नाम पर कमाई धन्दा छै,
एकर उत्थानक फिकिर नई छै,
मात्र मिथिला-मैथिली करैत छै,
प्रोजेक्ट आ सरकारी पद हडपै छै,
सदखनि टकाके टकटकीमे रहैत छै,
एकरे ओ प्रतिभा कहैत छै,
मिथिलाके दानापानीए बताह छै (।v)
